बड़ा सवाल: आधी आबादी को कब मिलेगा प्रतिनिधित्व का मौका

Mau, Uttar Pradesh, India
बड़ा सवाल: आधी आबादी को कब मिलेगा प्रतिनिधित्व का मौका

हर क्षेत्र में आगे रहने वाली महिलायें राजनीति में पीछे क्यूं

मऊ. देश को आजाद हुए सात दशक बीत गये। पर जिले की आधी आबादी को जनप्रतिनिधित्व का मौका कब मिलेगा इस  बात की चिंता शायद किसी को नहीं है।  जब बात होती है आधी आबादी को बराबरी का दर्जा देने की तो सभी राजनीतिक दल उनकी बराबरी के हक की बात तो करते है। पर हकीकत शायद कोसों दूर है।  सत्ता के सिंहासन से लेकर अंतरिक्ष तक में अपने हौसले का जज्बा मनवाने में कामयाब महिलायें आखिर राजनीति में पीछे क्यूं होती जा रही हैं। 

सबसे हम पहले हम इस बार 2017 के विधानसभा चुनाव में महिलाओ के नामांकन की बात करे तो जिले मे कुल चार महिलाओ ने नामाकंन किया है जिसमेें जिले की चार विधानसभा सीटे सदर मधुवन घोसी मुह्मदाबाद गोहाना ये चार विधानसभा है। सपा ने मधुवन विधानसभा से महिला आयोग कि अध्यक्षा सुमित्रा यादव को प्रत्याशी बनाया तो नामकांन के बाद उनका पर्चा वापस कर लिया क्योकि सपा काग्रेस गठबन्धन में यह सीट काग्रेस के पाले में चली गयी तो काग्रेस ने इस सीट पर पुराने नेता अमरेश चन्द पाण्डे को सौप दिया।

 इसके बार जिले के बाहुबली नेता मुख्तार अन्सारी की पत्नी अफसा अन्सारी ने जिले के दो विधानसभा सीटे सदर व घोसी ने निर्दल प्रत्रयाशी के रुप में अपना नामाकन कराया है, वैसे इनके बारे में कहा जाता है कि जब मुख्तार अन्सारी का पर्चा वैध हो जाता है तो यह अपना पर्चा वापस कर लेती है, इस तरह दो महिला प्रत्याशियो की हालत खस्ता हाल है, वही एक महिला सदर से को मधुवन विधानसभा से पर्चा दाखिल किया है जिसमें इन्दू ने मधुवन विधानसभा से आम्बेडकर नेशनल काग्रेस पार्टी से नामाकन किया है तो वही मिना कुमारी सदर विधानसभा से पूर्वांचल पिपुल्स पार्टी से नामांकन दाखिल किया है हालाकि इन दोनो महिलाओ का कोई राजनीतिक कैरियर नही है ये राजनीति की नयी खिलाडी है, सो देखना ये कि क्या दोनो महिलाऐं चुनाव में आधी आबादी को अपने पक्ष में लुभा पाने में कामयाब होती है या फिर शिकस्त खाती है।

इसके अलवा पिछले चुनावो पर नजर डाले तो मऊ जिले मे सदर विधानसभा पर जिले के विकास पुरुष कहे जाने वाले कल्पनाथ राय  की पुत्र बधु सीता राया ने भी चुनावी मैदान में दो बार चुनाव लड चुकी है लेकिन कोई फायदा नही हुआ उनकी उनकी पत्नि सुधा राया भी यहाँ के घोसी लोकसभा सीट पर दो दो बार चुनाव लडी है लेकिन एक बार भी इनको सफलता हाथ नही लगी पहली बार लोकसभा का चुनाव कल्पनाथ राय के मरने के बाद लडी थी लेकिन उसमें भी उनकी मौत के सहानुभुति का भी कोई असर नही दिखा और यहा से सीट पर बालकृष्ण चौहान को बसपा से जीत मिली थी उसके , वही इसी घोसी विधानसभा की सीट पर काग्रेस ने अपना प्रत्याशी पिछली पर राना खातून को मैदान में उतारा था इनको भी कोई फायदा नही मिला है।


फिलहाल जिले के हालात पर नजर डाले तो जिले में अभी तक आधी आबादी की तरफ से कोई विशेष फायदा महिला नेताओ को नही मिला है, हालाकि इधर के कुछ वर्षो में जिले में महिला नेताओ की सँख्या तो जरुर बढी है लेकिन वो सभी टक्कर के बाहर है देखना ये होगा क्या जिले में कभी महिला जनप्रतिनिधि चुनी जायेगी या फिर ये सपने जैसा ही होगा कि जिले में महिला आबादी को जनप्रतिनिधित्व करने का मौका मिले। 

Rajasthan Patrika Live TV

1
Ad Block is Banned