तब चर्बीयुक्त कारतूस मुंह से नहीं खोलने की कसमें गंगाजल आैर कुरान लेकर खार्इं थी

Meerut, Uttar Pradesh, India
तब चर्बीयुक्त कारतूस मुंह से नहीं खोलने की कसमें गंगाजल आैर कुरान लेकर खार्इं थी

२३ अप्रैल १८५७ की शाम को ब्रिटिश जनरल का आदेश पहुंचा था भारतीय सैनिकों के खेमे में

मेरठ। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए मेरठ से बिगुल २३ अप्रैल १८५७ को ही बज गया था, जब शाम को ब्रिटिश जनरल का आदेश यहां भारतीय सैनिकों  के पास पहुंचाया गया कि नर्इ ब्राउन बेस एंड इनफील्ड राइफल्स के लिए नए कारतूस के प्रयोग के लिए सैनिकों को ट्रेंड किया जाए। इस कारतूस की खास बात यह थी कि इसमें भरी बारुद के उूपर गाय आैर सूअर की चर्बी की लेयर होती थी, उसे मुंह से खोलकर बंदूक में लोड करके कारतूस चलाया जाता था। भारतीय सैनिकों को यह बात मालूम थी। तीसरी हल्की अश्वरोही सेना ही बंदूक चलाती थी, इसलिए इस सैन्य यूनिट के पास जब जनरल का आदेश पहुंचा, तो भारतीय सैनिकों में खलबली मच गर्इ। हिन्दू आैर मुस्लिम सैनिकों ने अगले दिन सुबह ५ से ७ बजे तक होने वाली परेड में कारतूस को मुंह क्या, हाथ में लगाने की कसमें खार्इ, गंगाजल आैर कुरान में हाथ में लेकर। इसके बाद तो बस जो घटनाक्रम होता गया, वह सब इतिहास बनता गया।

बैरकपुर कैंट की घटना के बाद

इससे पहले बैरकपुर कैंट में २९ मार्च १८५७ को भारतीय सैनिक मंगल पांडे ने अपने अन्य साथियों र्इश्वरी पांडे आदि के साथ मिलकर अंग्रेज अफसरों पर हमला बोल दिया था।  इन अरेस्ट कर लिया गया आैर कोर्ट आफ इन्क्वायरी बिठार्इ गर्इ। इसमें मंगल पांडे व उनके साथियों को दोषी माना गया। इसके बाद  आठ अप्रैल १८५७ को फांसी दे दी गर्इ। इसके ठीक १५ दिन बाद मेरठ कैंट से देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत हो गर्इ।

नायक शेख पीर अली को दिया पहला कारतूस

२४ अप्रैल को सुबह सेंट जोंस चर्च के पीछे परेड ग्राउंड पर मेरठ कैंट की सभी सैन्य यूनिटों को प्रदर्शन के लिए बुलाया गया था। तीसरी हल्की अश्वरोही सेना की टुकड़ी के जवानों को चलाने के लिए कारतूस दिया जाने लगा। सबसे पहले नायक शेख पीर अली को यह कारतूस दिया गया।  शेख पीर ने इसे यह कहते हुए लेने से मना कर दिया कि जब अन्य सैनिक लेंगे, तभी इसे लूंगा। इसके बाद इनके पीछे खड़े नाायक कुदरत अली ने भी यहीं जवाब दिया। एक के बाद एक सभी भारतीय का यही जवाब था। कारतूस किसी ने नहीं लिया। इनका कहना था कि चर्बीयुक्त कारतूस को मुंंह लगाने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। इसलिए हम किसी भी कीमत पर मुंह से नहीं लगाएंगे।  इससे वहां मौजूद ब्रिटिश अफसरों ने मना करने पर काफी गुस्सा दिखाया।

इनका कहना है...
राजकीय स्वतंत्रता संग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष डा. मनोज कुमार गौतम का कहना है कि भारतीय सैनिकों को जो कारतूस दिए गए थे, उनमें बारुद ढकने के लिए जिस चर्बी की लेयर को दांत में फंसाकर खोलने के बाद बंदूक में लोड करना था, जिसे करने से भारतीय सैनिकों ने साफ मना कर दिया था।

 

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