इस सीट पर है बसपा का कब्जा, इतने सालों से लागातार जीत का परचम लहरा रहे ये इस नेता 

Mirzapur, Uttar Pradesh, India
इस सीट पर है बसपा का कब्जा, इतने सालों से लागातार जीत का परचम लहरा रहे ये इस नेता 

इस सीट पर है बसपा का कब्जा, कोई नहीं तोड़ पाया जीत का तिलस्म... 

सुरेश सिंह

मिर्ज़ापुर. मझवां विधान सभा वाराणसी जिले की सीमाओं से  होते हुए शहर विधान सभा तक फैला है। अगर बात की जाय इस विधान सभा क्षेत्र की राजनैतिक पृष्टभूमि का तो 1952 में पहली बार विधान सभा क्षेत्र बनने के बाद इस सीट से कई दिग्गज प्रत्याशियों ने अपनी किश्मत आजमाई और विजय श्री हांसिल की है।

कांग्रेस के कद्दावर नेता पंडित लोक पति त्रिपाठी से लेकर बसपा के दिग्गज नेता व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भगवत पाल ने इस सीट जीत कर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यह सीट 1952 से 1969 तक अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व थी। मगर 1974 में सामान्य होने के बाद इस सीट से पहली बार कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में रूद्र प्रसाद ने जीत हासिल की थी।


इसके बाद पंडित लोकपति त्रिपाठी के चुने जाने के बाद यह सीट प्रदेश के वी वीआईपी विधान सभा सीटो में  होती थी। 1991 में बसपा के भगवत पाल के जितने के बाद भी यह सीट प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका में रही। उस समय भगवत पाल बसपा के बड़े नेताओं में से एक थे। भगवत पाल ने दो बार इस  सीट पर विजय हासिल की।

इसके बाद 1996 में  भाजपा के रामचंद्र चुनाव जीते। पिछले तीन विधान सभा चुनाव 2002  से यह सीट से बसपा के पास है। यहां से रमेश विंद लगातार तीन बार से विधायक है। इस बार भी बसपा ने रमेश विंद को ही मैदान में उतरा है पिछले विधान सभा चुनाव 2012 में प्रदेश में सपा लहर के बावजूद इस सीट पर रमेश विंद ने 83870 मत पा कर सपा के राजेंद्र प्रसाद पांडे को हराया था। 


मझवां विधान सभा में इस बार चुनावी मैदान में सपा ने रोहित उर्फ लल्लू शुक्ला को उतारा है, तो वहीं भाजपा ने पिछड़े वर्ग से महिला प्रत्याशी सुचिस्मिता मौर्या को टिकट देकर  बसपा को घेरने की कोशिश की है। इस सीट पर हमेशा ही बिंद, मौर्य, ब्राह्मण मतदाताओं ने किसी के जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते आये हैं। बसपा भी इसी दलित और बिंद समीकरण पर पिछले तीन बार से इस सीट पर जीत हासिल करती आ रही है। 


मगर इस बार यह सीट त्रिकोणीय लड़ाई के चक्रव्यूह में फसी हुई दिख रही है। इस सीट पर बसपा की राह इतनी आसान नहीं है। अभी भी यह विधान सभा क्षेत्र  विकास की राह देख रहा है। ख़राब सड़के पिछले 15 सालों से गंगा नदी पर बना रहा बहुप्रतीक्षित भटौली का पुल एक बार फिर मुद्दा बन सकता है। वहीं युवाओं को रोजगार के लिए बाहर जाना भी मुद्दा बन सकता है। मगर विकास के मुद्दे पर जातीय समीकरण यहां पर  हमेशा ही भारी रहा है। फिलहाल देखना होगा कि इस बार यह समीकरण बदलता या नहीं और सपा और भाजपा, बसपा जीत के तिलस्म  को तोड़ पाती है या नहीं।
बता दें कि, मुख्तार अंसारी के पै रोल पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार तक रोक लगा दी है।

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