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आबूरोड : परमार शासकों की राजधानी चंद्रावती नगरी का होगा संरक्षण

locationसिरोहीPublished: Mar 09, 2017 01:32:17 pm

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rajendra denok

'देर आयद, दुरुस्त आयदÓ कहावत को चरितार्थ करने के लिए मुख्यमंत्री ने बुधवार को विधानसभा में प्रस्तुत वर्ष 2017-18 के बजट में पुरातन नगरी चंद्रावती के संरक्षण एवं विकास के कार्यों की घोषणा की है।

आबूरोड : परमार शासकों की राजधानी चंद्रावती नगरी का होगा संरक्षण
parmar rulers capital chandrawati will be protected in aburoad
'देर आयद, दुरुस्त आयदÓ कहावत को चरितार्थ करने के लिए मुख्यमंत्री ने बुधवार को विधानसभा में प्रस्तुत वर्ष 2017-18 के बजट में पुरातन नगरी चंद्रावती के संरक्षण एवं विकास के कार्यों की घोषणा की है। बजट भाषण की यह घोषणा से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे उन पुरातन स्ट्रक्चरों को जीवनदान मिलेगो, जिन्हें वर्ष 2013 से 2015 के दौरान तीन चरणों में उत्खनन कर खोला गया था और वर्तमान में बदहाली का शिकार हो रहे हैं। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि संरक्षा के अभाव में मवेशी व बरसाती पानी के कारण ये तहस-नहस हो रहे हैं। उन पुरावशेषों, जिनमें अधिकतर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां है, को भी संरक्षण मिलेगा, जो फिलहाल चंद्रावती में ही पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में पड़े हुए है। शिवपंचायत शैली के मंदिरों के मलबे में कई मंदिर दबे पड़े है। काफी सम्भव है कि इन मंदिरों के स्ट्रक्चर भी खुलवाने की कवायद शुरू हो जाए। बदहाली के कारण ही न तो पुरातत्व प्रेमी और न ही सैलानी इन्हें देखने के लिए आकर्षित हो रहे है, लेकिन अब बजट घोषणा के मुताबिक संरक्षण व विकास के कार्य होने से पुरातन चंद्रावती नगरी पयर्टन के लिहाज से भी सैलानियों को आकर्षित करने में कामयाब होने की उम्मीद बढ़ गई है।
महज तारबंदी करवाकर अपने हाल पर छोड़ा
दरअसल पुरातत्व विभाग ने करीब चालीस लाख रुपए की लागत से उदयपुर के जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ से एमओयू कर उत्खनन करवाया था। तीन चरणों में हुए उत्खनन में तत्कालीन शासकों के दो किले, किले में निवासरत दरबारियों के आवास, किले के बुर्ज, किले की चारदीवारी, किले का मुख्य द्वार, आम लोगों के आवास अदि के कई स्ट्रक्चर खुलवाए गए थे। उत्खनन के दौरान इन स्ट्रक्चरों से कई पुरामहत्व की वस्तुएं भी निकली थी, जिनमें से कुछ को तो विभाग के चंद्रावती स्थित संग्रहालय में सुरक्षित रखवाया गया और कुछ सैलानियों के अवलोकन के लिए मौके पर ही रखवाई गई। सैलानियों व पुरातत्व प्रेमियों के लिए ये दर्जनभर स्ट्रक्चर आकर्षण का केन्द्र बने भी, पर विभाग ने इनकी सुरक्षा के लिए महज चारों ओर तारबंदी करवा कर इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया।
बारिश के कारण सारे स्ट्रक्चर हो चुके है बदहाल
बरसाती पानी से इन स्ट्रक्चरों व पुरा महत्व की वस्तुओं को बचाने की पुख्ता व्यवस्था नहीं की गई। बारिश का पानी इन स्ट्रक्चरों में उतरने से ईंटों की दीवार की चुनाई में उपयोग में ली गई मिट्टी पानी के कारण धुलकर ईंटों के बीच से निकल रही है। स्ट्रक्चरों में पानी उतरने से इनकी नींव भी कमजोर हो रही है। इन स्ट्रक्चरों में रखे मिट्टी के पात्रों को मवेशियों ने तोड़ दिया है। करीब ग्यारहवीं-बारहवीं सदी की मिट्टी से बनी चक्की तहस-नहस हो चुकी है। सभी स्ट्रक्चरों में घास-फुस व अंग्रेजी बबूल की झाडिय़ों ने साम्राज्य स्थापित कर लिया है।
महज एक स्ट्रक्चर पर बनवाया छप्पर
किले के स्ट्रक्चर की पूर्व दिशा में खोले गए स्ट्रक्चर पर टीन की चद्दरों का एक छप्पर जरूर बनवाया गया है, पर इसमें बारिश का पानी जाने से रोकने की कोई व्यवस्था नहीं की जाने से बरसाती पानी इसमें उतरने से स्ट्रक्चर का ढांचा तहस-नहस हो रहा है। उसमें से निकला एक मिट्टी का विशाल पात्र भी उसी में रखवाया गया था, जिसे किसी ने फोड़ डाला। अब पात्र की जगह वहां पात्र के ठीकरे ही नजर आ रहे हैं।
संग्रहालय भी नहीं लग रहा खूबसूरत
वैसे तो पुरातत्व विभाग ने कई साल पूर्व चंद्रावती में संग्रहालय भवन का निर्माण करवाकर पुरामहत्व की कई मूर्तियां इसमें रखवाई गई थी, जो अब भी वहीं पड़ी हुई है। तत्कालीन राज्यपाल मार्गारेट अल्वा ने संग्रहालय का अवलोकन करने के बाद इसे अत्याधुनिक बनाने के लिए राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजने के एसडीएम को निर्देश भी दिए थे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि पुराने भवन का विस्तार कर पास में विशाल भवन का निर्माण जरूर करवाया गया, लेकिन उसमें लाइटिंग आदि की व्यवस्था नहीं की गई।
स्वर्ण इतिहास रहा है चंद्रावती का
ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में चंद्रावती नगरी परमार शासकों की राजधानी रही हुई है। यशोधवल व धारवर्ष सरीखे राजा इसके प्रतापी शासक रह चुके हैं। उस समय में शैव-वैष्णव व जैन मंदिरों की भरमार थी। ईस्वी सन् 1303 तक यह परमारों की राजधानी रहने के बाद यहां देवड़ा चौहानों का शासन स्थापित हो गया। ईस्वी सन् 1405 में सिरोही राज्य की स्थापना होने तक यह देवड़ा शासकों की राजधानी बनी रही। उस समय दिल्ली-गुजरात मार्ग पर यह समृद्धशाली नगरी रही होने से आक्रांताओं ने इसे अनेक बार लूटा। मंदिरों को तहस-नहस कर दिया। इन मंदिरों की स्थापत्य शैली व भव्यता का ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल टॉड अपनी पुस्तक वेस्टर्न इंडिया में सचित्र वर्णन कर चुके हैं।

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