Movie Review: 'बेगम जान' ने कुरेदा हिंदुस्तान के सबसे पुराने जख्म को और बयां की दर्द की कहानी

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Movie Review: 'बेगम जान' ने कुरेदा हिंदुस्तान के सबसे पुराने जख्म को और बयां की दर्द की कहानी

कलाकार: विद्या बालन, गौहर खान, पल्लवी, चंकी पांडेय, आशीष विद्यार्थी, रजत कपूर और नसीरुरद्दीन शाह, रेटिग: 3 स्टार

निर्माता: विशेष फिल्म्स
डायरेक्टर: श्रीजीत मुखर्जी

मुंबई। विद्या बालन ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि कहानी अच्छी हो और उसे सही ढंग से लिखा गया हो, तो उसे पर्दे पर साकार करने में वो कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। जी हां, लंबे समय से बिद्या को ऐसे ही दमदार किरदार की जरूरत थी और जब उन्हें ये मौका बेगम जान में मिला, तो उन्होंने अपने किरदार में जान फूंक दी। बंगाली हिट फिल्म राजकहिनी के इस हिंदी रीमेक में हर वह बात, जो एक बेहतरीन सिनेमा के लिए जरूरी होती है, फिर चाहे वह बेहतरीन अदाकारी हो, कैमरे का कमाल हो, सॉलिड कैरक्टराइजेशन हो या कहानी... हर मोर्चे पर बेगम जान खरी उतरती है। फिल्म पूरी तरह से इस बात पर फोकस है कि मर्दों की दुनिया में औरतों को अपने दम पर जीना और मरना दोनों ही आता है। कुल मिलाकर डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी ने हर घटनाक्रम को बड़ी बारीकी से इस फिल्म में दर्शाया है। मानवीय संवेदानाओं के ताने-बाने पर आधारित ये फिल्म समाज को आईना दिखाती है।


कहानी...
फिल्म की कहानी उस दौर की है, जब देश आजाद हुआ था। आजादी के बाद भारत से पाकिस्तान को अलग करने के लिए गई लाइन के बीच बेगम जान (विद्या बालन) का कोठा भी आ जाता है, जहां कुछ लड़कियां रहती हैं। दोनों देश के अफसर किसी भी हद तक जा कर बेगम जान के कोठे को खाली करवाना चाहते हैं। लेकिन सरकारी आदेश को ना मानते हुए बेगम जान अपना घर छोडऩे के लिए राजी नहीं होती। फिर शुरू होता है सरकार और बेगम जान के बीच संघर्ष, जिसमें बेगम जान का साथ 10 महिलाएं और 2 पुरुष देते हैं। ये सब बेगम जान के परिवार का हिस्सा हैं, लेकिन क्या तमाम मुश्किलों से थक कर बेगम जान अपना घर खाली कर देगी? क्या वो सरकार के आगे घुटने टेक देगी? कैसे बेगम जान अपने घर को बचाएगी फिल्म की कहानी इसी ताने बाने पर बुनी है, जिसके सीन दर सीन रोंगटे खड़े कर देते हैं।

अभिनय...
वैसे तो फिल्म के केंद्र में विद्या बालन हैं, लेकिन बाकी किरदारों को भी श्रीजीत ने मोती के माला की तरह पिराए हैं, जो एक कोलाज की तरह नजर आते हैं। फिल्म में हर किरदार की अपनी अहमियत है। इसमें कोई दोराय नहीं कि विद्या ने इसमें शानदार अभिनय किया है, अपनी दमदार एक्टिंग के बदौलत विद्या ने कहानी को पर्दे पर जीवंत कर दिया है, लेकिन बाकी किरदारों के बिना उनका किरदार पूर्ण नहीं होता है। फिल्म में गौहर खान का किरदार यादगार है। वे जब अपने सीने और जांघों के बीच अपने प्रेमी का हाथ रखकर उसे औरत होने का मतलब समझाती है, तो फिल्म पितृसत्तात्मक समाज के मुंह पर तमाचा जड़ते हुए लगती है। पल्लवी शारदा ने भी शानदार एक्टिंग की है। चंकी पांडेय ने कबीर का जो रोल किया है, उसे लंबे समय तक याद रखा जा सकेगा। उन्होंने दंगा कराने में माहिर काइयां शख्स के अपने रोल को इतने खूबसूरती से निभाया है, जो वाकई काबिले तारीफ  है और नफरत बटोरने में सफल होते हैं।
निर्देशन...
फिल्म का डायरेक्शन काफी लाजवाब है और साथ ही सिनेमेटोग्राफी, ड्रोन कैमरे के मदद से लिए गए शॉट्स इसे एक बेहतर फिल्म बनाती है। श्रीजीत मुखर्जी ने कमाल का काम किया है।

क्यों देखें...
यदि आपको लीग से हटकर फिल्में देखना पसंद है, तो ये फिल्म आपको बेहद पसंद आएगी। फिल्म में ड्रामा आपको कुर्सी से उठने नहीं देगा।

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