MOVIE REVIEW : बॉक्सिंग का अंदाज 'साला खड़ूस'

Rakhi Singh

Publish: Jan, 29 2016 10:25:00 (IST)

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MOVIE REVIEW : बॉक्सिंग का अंदाज 'साला खड़ूस'

फिल्म में बॉक्सिंग को बहुत ही करीब से दिखाने और अपने जुदा अंदाज में ऑडियंस के सामने परोसने का पूरा प्रयास किया है।

रोहित तिवारी

बैनर : राजकुमार हिरानी फिल्म्स, ट्राईकलर्स प्रोडक्शंस प्रा. लि., यूटीवी मोशन पिक्चर्स
निर्माता : राजकुमार हिरानी, सिद्धार्थ रॉय कपूर
निर्देशक : सुधा कोंगारा
जोनर : थ्रिलर
गीतकार : विशाल डडलानी, सुनिधि चौहान, मोनाली ठाकुर, विजयनारायण, कल्याणी नायर
संगीतकार : संतोष नारायणन
स्टारकास्ट : आर माधवन, नसीर, जाकिर हुसैन, रितिका सिंह, मुमताज सोरकर

रेटिंग :3.5


बी-टाउन की नवनिर्देशिका सुधा कोंगारा ने बॉक्सिंग को बहुत ही करीब से दिखाने और अपने जुदा अंदाज में ऑडियंस के सामने परोसने का पूरा प्रयास किया है। उन्होंने अपने निर्देशन में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी और हर तरह से कुछ नया कर दिखाने की भरपूर कोशिश की है।

कहानी :

फिल्म की 109 मिनट की कहानी हिसार से शुरू होती है, जहां बॉक्सिंग कैंप होता है। बस, वहीं से आदि तोमर (आर. माधवन) पर शारीरिक शोषण का केस लाद दिया जाता है और उसे नौकरी से निकालने की बजाय बॉक्सिंग के मामले में काला पानी माने जाने वाले शहर चेन्नई में ट्रांसफर कर दिया जाता है। वाकई में यह सारा खेल बॉक्सिंग डिपार्टमेंट के सबसे बड़े अधिकारी जाकिर हुसैन की रणनीति के अनुसार होता है, जिन्हें चाटुकारिता के अलावा टैलेंट की समझ भी नहीं होती है। खैर, आदि चेन्नई जैसी दयनीय स्थिति में जी रहे लोगों के बीच से एक टैलेंट को पहचान जाता है। अब वह पांड्यन (नासिर) की देखरेख में मधी (रितिका सिंह) को ट्रेंड करता है और साथ ही उसकी बहन लक्स (मुमताज सोरकर) को भी सिखाता है, लेकिन मधी की तुलना में लक्स पीछे रह जाती है। बस, वहीं से दोनों बहनों के बीच एक दीवार सी आ जाती है। खैर, इसी के साथ फिल्म में गजब का ट्विस्ट आता है और कहानी तरह-तरह के मोड़ लेते हुए आगे बढ़ती है।

अभिनय :

आर माधवन ने अपने अभिनय में हर तरह से फिट दिखने का पूरा प्रयास किया है, जिसमें में सफल भी रहे। माधवन वाकई में कुछ अलग करने की चाहत लिए उसकी तह तक जाते से दिखाई दिए। साथ ही रितिका सिंह ने भी अपनी पहली ही पारी में ऑडियंस के सामने खुद को साबित कर दिखाया है कि अगर अभिनय दिल से किया जाए तो भला उसमें निखार क्यों नहीं लाया जा सकता। यानी वे माधवन की उम्मीदों पर खरी उतरती नजर आईं। मुमताज सोरकर भी अपना मुकाम पाने के लिए एक बहन के किरदार में फिट रहीं। इसके अलावा जाकिर हुसैन और नासिर ने भी अपने-अपने रोल को बखूबी अदा किया है।
 
निर्देशन :

बी-टाउन में अपनी पहली फिल्म के निर्देशन से किस्मत आजमाने की हिम्मत रखने वाली निर्देशिका सुधा कोंगारा ने वाकई में कुछ अलग करने की पूरी कोशिश है। बॉक्सिंग जैसे दिलचस्प खेल को उजागर करने वाली कहानी के निर्देशन में उन्होंने हर तरह के प्रयोग दमदार प्रयोग किए हैं। साथ ही सुधा ने ऑडियंस को अपनी ओर आकर्षित करने का दमदार प्रयास भी किए हैं। यानी उन्होंने प्रूव कर दिखाया है कि बस कहानी में दम होना चाहिए...। खैर, उन्होंने इसमें थ्रिलर का जोरदार तड़का तो जरूर लगाया है, लेकिन कहीं-कहीं उन्हें थोड़ा अलग करने की भी जरूरत सी दिखाई दी। सुधा ने एक बॉक्सर की कहानी को अपने निराले अंदाज में परोसा है। इसीलिए वे ऑडियंस की वाहवाही बटोरने में सफल रहीं। बहरहाल, 'खेल से पॉलिटिक्स हटा कर तो देखो...' व 'वो बिजली का खंभा है, तेरे दारू का अड्डा नहीं...' जैसे कई डायलॉग्स दर्शको को हंसने पर मजबूर कर देते हैं, लेकिन अगर टेक्नोलॉजी व सिनेमेटाग्राफी के अंदाज को छोड़ दिया जाए तो कोरियोग्राफी में कुछ नया करने की जरूरत भी महसूस हुई। इसके अलावा इसमें संगीत (संतोष नारायणन) और गाने भी अपनी अलग अहमियत बताने और दिखाने में काफी हद तक सफल रहे।   

क्यों देखें :

एक रियल बॉक्सर को बड़े पर्दे पर देखने और उसकी जिंदगी के उतार-चढ़ाव को देखने की चाहत रखने वाले इसे देखने के लिए सिनेमाघरों की ओर रुख कर सकते हैं।

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