Movie Review: स्क्रिप्ट में 'फाल्ट', फ्यूज हुई सलमान की 'ट्यूबलाइट' 

Dilip chaturvedi

Publish: Jun, 23 2017 06:11:00 (IST)

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Movie Review: स्क्रिप्ट में 'फाल्ट', फ्यूज हुई सलमान की 'ट्यूबलाइट' 

कलाकार: सलमान खान, सोहैल खान, झू झू, ओमपुरी, यशपाल शर्मा, मातिन रे टंगू, बृजेन्द्र काला, शाहरुख खान (कैमियो)

डायरेक्शन : कबीर खान
संगीत: प्रीतम
अवधि: 136 मिनट
रेटिंग : 2.5  स्टार

आर्यन शर्मा। सुपरस्टार सलमान खान और निर्देशक कबीर खान की जोड़ी ने 'एक था टाइगर' और 'बजंरगी भाईजान' सरीखी सुपरहिट फिल्में दी हैं। अब यह जोड़ी फिल्म 'ट्यूबलाइट' लेकर आई है। 'यदि आपको यकीन है, तो आप कुछ भी कर सकते हैं' फलसफे के इर्द-गिर्द बुनी गई इस कहानी की पृष्ठभूमि में 1962 का भारत-चीन युद्ध है। फिल्म में भावनात्मक दृश्य भी हैं, लेकिन ये दृश्य सिर्फ पर्दे पर दिखते भर हैं, दर्शकों के इमोशंस को कनेक्ट नहीं करते। फिल्म में सलमान को उनकी चिर-परिचित माचोमैन की छवि के विपरीत सादगी से भरपूर किरदार में प्रजेंट किया है। यही नहीं, इस किरदार का दिमाग बच्चों जैसा है। फिल्म सलमान पर दर्शकों के 'यकीन' के पिटारे को तो खोलती है, लेकिन लचर स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले के कारण दर्शकों को मनोरंजन का बेहतरीन तोहफा नहीं दे पाती।


कहानी...
कुमाऊं स्थित जगतपुर में दो भाई लक्ष्मण सिंह बिस्ट (सलमान) और भरत (सोहैल खान) रहते हैं। लक्ष्मण बचपन से ही मंदबुद्धि है, उसे कोई भी बात देर से समझ आती है। ऐसे में सभी उसे 'ट्यूबलाइट' कहकर चिढ़ाते हैं, लेकिन भरत लक्ष्मण की ढाल बन जाता है और उसे चिढ़ाने वालों का सबक सिखाता है। वह लक्ष्मण को कप्तान कहता है। इधर, 1962 का भारत-चीन युद्ध छिड़ जाता है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नवयुवकों की फौज में भर्ती हो रही होती है और भरत फौज में भर्ती हो जाता है। फिर वह दुश्मनों से लोहा लेने बॉर्डर पर चला जाता है। इसके बाद कहानी कुछ घुमाव लेते हुए ट्विस्ट के साथ आगे बढ़ती है।

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अभिनय...
सलमान ने बढिय़ा काम किया है। बाल कलाकार मातिन रे टंगू के साथ उनकी कैमिस्ट्री जमी है। दिवंगत ओम पुरी की परफॉर्मेंस भी शानदार है। सोहैल और मोहम्मद जीशान अयूब ने सहज अभिनय किया है। चाइनीज एक्ट्रेस झू झू अच्छी लगी हैं, पर उनके किरदार को विस्तार नहीं दिया गया। कैमियो, लेकिन इम्पॉर्टेंट रोल में शाहरुख खान प्रभावित करते हैं।

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निर्देशन...
फिल्म का माइनस पॉइंट इसका राइटिंग पार्ट है। स्क्रीनप्ले बिखरा हुआ है। कबीर का डायरेक्शन भी फुल फ्लो में नहीं है। वह न तो युद्ध पर फोकस कर पाए, ना ही इमोशंस को उभार पाए। ऐसे में फिल्म का भावनात्मक सफर बोर करने लगता है। हालांकि लोकेशंस खूबसूरत हैं और असीम मिश्रा का कैमरा वर्क कमाल का है। गीत-संगीत औसत है। 'सजन रेडियो', 'तिनका-तिनका' सॉन्ग ही ठीक हैं।

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क्यों देखें?       
सलमान फ्रेश अवतार में हैं, लेकिन उनके उन फैंस को निराशा हो सकती है, जो पर्दे पर उनका दबंग अंदाज पसंद करते हैं। वहीं, फिल्म में शुरू से अंत तक 'यकीन' शब्द का जाप एक समय पर आकर अखरने लगता है। फिल्म में भाई का भाई के लिए प्रेम है, विश्वास है, पर कमी है, तो जुड़ाव की। युद्ध के दृश्य हैं, पर उनमें देशप्रेम की भावना नहीं है। ऐसे में सलमान के फैंस उन पर यकीन करके 'ट्यूबलाइट' देखने जाएं।  

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