सत्ता से परे

Shankar Sharma

Publish: Apr, 17 2017 11:33:00 (IST)

Opinion
सत्ता से परे

सत्ता से विलग नेता जी ने फरमाया कि आज की राजनीति परिवार और व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूम रही है। सत्य वचन। आज हरेक दल में परिवारवाद हावी है चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा। बसपा हो या समाजवादी। उत्तर प्रदेश हो या बिहार


व्यंग्य राही की कलम से
यह जो 'सत्ता' नामक सुंदरी है न, इसके खेल भी बड़े ही जबर्दस्त है। जब यह किसी मनुष्य के साथ होती है तो वह लगभग बौराया हुआ ही होता है। एक अजीब सी मादकता से भरा रहता है। ऐसी मादकता जो गांजा की चिलम का सुट्टा लगाने, अंग्रेजी शराब के दो पेग पीने और भंग भवानी के सेवन के पश्चात आदमी के दिमाग में चढ़ जाती है।

सत्ता का नशा तो इन सारे नशों से चार गुणा हावी रहता है। लेकिन जैसे ही कोई नेता सत्ता से दूर हो जाता है, उसका हाल उस नशेबाज का सा हो जाता है जिसे जबरन नशे से दूर कर दिया गया हो। शुरू-शुरू में तो कभी वह अपने बाल नोचता है, कभी अपने और कभी दूसरों के कपड़े फाड़ता है और कभी उन लोगों के खिलाफ अनर्गल बातें बनाता है जिन्होंने उससे सत्ता छीनी है। लेकिन जैसे-जैसे वह इस सत्य को स्वीकार करने लगता है कि अब सत्ता सुन्दरी मेरे आगोश से छिटकर मेरे प्रतिद्वंद्वी की अंकशायनी बन गई है तो उससे 'ज्ञान' फूटने लगता है। उसके मुंह से शाश्वत सत्य झरने लग जाता है।

सत्ता से परे हुए कांग्रेस के नेता अब इसी हाल को प्राप्त हो रहे हैं। मसलन कांग्रेस के विद्वान महासचिव महोदय ने बातों ही बातों में इतने ज्ञान की बातें कहीं कि हम हैरत मेें पड़े सोचने लगे कि काश यह ज्ञान उन्हें सत्ता में रहते उपजता तो सत्ता सुंदरी इन्हें कदापि नहीं छोड़ती। सत्ता से विलग नेता जी ने फरमाया कि आज की राजनीति परिवार और व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूम रही है। सत्य वचन।

आज हरेक दल में परिवारवाद हावी है चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा। बसपा हो या समाजवादी। उत्तर प्रदेश हो या बिहार। लेकिन, इस परिवारवाद की जननी तो कांग्रेस ही है न। अब यह रोग भारतीय जनता पार्टी में भी तेजी से फैल रहा है। सत्ता से दूर होते ही नेताओं के दिलों में कैसे सच का झरना फूट पड़ता है, नेताजी का भाषण इसका प्रचंड उदाहरण है और कुर्सी पर बैठते ही 'तू देव तो मैं मेव।

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