लोकतंत्र का सत्तातंत्र

Mukesh Sharma

Publish: Feb, 16 2017 11:34:00 (IST)

Opinion
लोकतंत्र का सत्तातंत्र

तमिलनाडु में सत्ता संघर्ष का आखिरकार पटाक्षेप हो ही गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले कुछ दिनों से चले आ रहे

तमिलनाडु में सत्ता संघर्ष का आखिरकार पटाक्षेप हो ही गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले कुछ दिनों से चले आ रहे राजनीतिक घमासान पर विराम लग गया है। राज्यपाल विद्यासागर राव ने गुरुवार को ई. पलानिसामी को बतौर मुख्यमंत्री शपथ दिलाई। तमिलनाडु की राजनीतिक उठापटक ने एक बार फिर से भारतीय लोकतंत्र के सत्तातंत्र को बेनकाब कर दिया है।


जयललिता ने पन्नीरसेल्वम को अपना उत्तराधिकारी मानते हुए तीन बार मुख्यमंत्री पद पर बैठाया था। तब शशिकला अथवा पलानिसामी कहीं भी तस्वीर में नहीं थे। लेकिन जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु में कुर्सी का ऐसा खेल चला कि आमजनता केवल मूक दर्शक ही बनी रह गई है। तमिलनाडु की जमीनी हकीकत देखें तो जयललिता के बाद पन्नीरसेल्वम को लोगों का खासा जनसमर्थन प्राप्त था। लेकिन संख्या बल में पिछडऩे के कारण पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री पद नहीं मिल पाया। पलानिसामी तो मुख्यमंत्री की दौड़ में कहीं भी नहीं थे। लेकिन अन्नाद्रमुक के अधिकांश विधायकों ने  शशिकला कैंप में ही रहना उचित समझा। आखिरकार चार-साढ़े चार साल की सत्ता जो उन्हें नजर आ रही है।


 शशिकला कैंप के विधायकों ने सत्ता के साथ रहने के विकल्प को चुना। पुन: चुनाव में जाने  से परहेज किया। बड़ा सवाल है कि क्या तमिलनाडु की जनता के साथ न्याय हुआ या फिर उन्हें केवल सरकार मिली। शशिकला को अगले चार वर्ष जेल में काटने हैं। यानी वे बेंगलूरु की जेल से 'रिमोट कंट्रोलÓ के द्वारा तमिलनाडु की सरकार को चलाएंगी। तमिलनाडु की जनता ने बेशक अन्नाद्रमुक को बहुमत दिया था। लेकिन वोट देते समय शशिकला अथवा ई. पलानिसामी कहीं भी मतदाताओं के जेहन में नहीं थे।

 और अब तमिलनाडु की जनता को इन 'चेहरोंÓ से शासित होना पड़ेगा। भारतीय लोकतंत्र के इस सत्तातंत्र को राजनीतिक ठेकेदारों के चंगुल से छुड़ाना ही होगा। लेकिन इस दिशा में राजनेताओं से पहल की आस करना बेमानी ही होगा। मतदाताओं को ही कमर कसनी होगी। सबक सिखाना होगा, इस सत्तातंत्र को। लेाकतंत्र में बहुमत के नाम पर लोगों की अपेक्षाओं का गला नहीं घोंट सकते हैं।

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