वेश की आड़ में

Shankar Sharma

Publish: Oct, 18 2016 10:17:00 (IST)

Opinion
वेश की आड़ में

पुराना किस्सा है। एक युवक ने, जो कि लेखकनुमा चीज था, ताल्सतॉय जैसी टोपी लगाई और हमारे जैसे कूड़मगज बुड्ढे के पास जा पहुंचा। बुड्ढे ने हंस कर कहा- अरे भले मानुस

व्यंग्य राही की कलम से
पुराना किस्सा है। एक युवक ने, जो कि लेखकनुमा चीज था, ताल्सतॉय जैसी टोपी लगाई और हमारे जैसे कूड़मगज बुड्ढे के पास जा पहुंचा। बुड्ढे ने हंस कर कहा- अरे भले मानुस। तुमने टोपी तो ताल्सतॉय सरीखी लगा ली लेकिन टोपी के नीचे जो चीज है वे कहां से लाओगे। आजकल यही चल रहा है। फिल्मी हीरोइनें महारानी गायत्री देवी जैसी खूबसूरत दिखने के लिए उसी पोज में फोटू तो खिंचवा लेती हैं पर वे महारानी जैसी गरिमा कहां से लाएंगी?

पिछले दिनों एक वरिष्ठ कवि मित्र ने बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से अपने केश और दाढ़ी बढ़ाये और एक रेशमी सरसराता लम्बा चोगा पहन रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसा वेश बना लिया। जब उनकी पहली रचना सामने आई तो पोल खुल गई। आदमी का वेश बड़ा खतरनाक होता है। वेश की आड़ में कई चोर अपनी वास्तविकता छिपा लेते हैं।

एक कलियुगी उपदेशक तो वेश की आड़ में क्या-क्या कर्म-कुकर्म कर बैठे और आज तक जेल में जमानत के लिए हाय-हाय करते फिर रहे हैं। राजनीतिक दल वाले भी तरह-तरह की वेशभूषा पहन कर जनता पर इम्प्रेशन डालने की कोशिश करते हैं। किसी जमाने में श्वेत कुरता पायजामा और गांधी टोपी कांग्रेसियों की पहचान थी। भाजपा वाले केसरिया से प्रेम करते हैं। वामपंथियों को लाल रंग प्रिय है तो मुस्लिम लीगियों को हरा। केजरीवाल ने अपनी टोपी पर आम आदमी लिखवा लिया लेकिन उसके ज्यादातर विधायकों की पोल खुल गई कि वे आम नहीं खास हैं।

इधर इस दशहरे से आरएसएस वालों की निकर फुलपेन्ट में बदल गई। लेकिन सिर पर काली टोपी और हाथ में लठ्ठ बरकरार है। बाल उडऩे के बाद हम भी भांति-भांति की टोपियां आजमा चुके हैं अंत में तय पाया कि गंजी चांद ही हम पर फबती है। लेकिन आपसे अर्ज करना चाहते हैं कि वेश के चक्कर में मत रहिए, वेश के भीतर छिपे इंसान को पहचानिए। वेश के चक्कर में तो  सीतामैया ही पचड़े में पड़ गई थी।


Rajasthan Patrika Live TV

1
Ad Block is Banned