मेरा जीवन और त्रिशक्ति के प्रभाव (अमीश)

Shankar Sharma

Publish: Apr, 17 2017 11:40:00 (IST)

Opinion
मेरा जीवन और त्रिशक्ति के प्रभाव (अमीश)

अकसर कहा जाता है कि व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी न किसी नारी का हाथ होता है। यह नारी मां हो सकती है, बहन या बेटी हो सकती है या फिर पत्नी भी हो सकती है। इनके बिना सफलता का शायद कोई मोल भी नहीं

अकसर कहा जाता है कि व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी न किसी नारी का हाथ होता है। यह नारी मां हो सकती है, बहन या बेटी हो सकती है या फिर पत्नी भी हो सकती है। इनके बिना सफलता का शायद कोई मोल भी नहीं। तीन नारियों की शक्ति का जीवन पर प्रभाव परिलक्षित करता यह आलेख...  

तीन महिलाओंं का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनसे संबंधित तीन प्रसंगों का जिक्र इस लेख में है। पहली किस्सा तब का है जब मैं करीब 8 साल का था। हम उड़ीसा के राउरकेला के पास कंसबहल नाम की एक कॉलोनी में रहते थे। मेरी मां बहुत ही अनुशासन प्रिय थीं, वहीं मेरे पिताजी थोड़े से उदार हृदय थे। एक दिन शाम को मैंने और मेरे जुड़वां भाई आशीष ने तय किया कि हम कॉलोनी के क्लब तक दौड़ लगाएं।

हमने जब मां से पूछा तो उन्होंने कहा, 'नहीं अभी तुमने अपना होमवर्क पूरा नहीं किया है।' एक घंटे बाद जब पापा ऑफिस से लौटे तो हमने उनसे पूछा और उन्होंने हमें हां कह दिया। हम खुशी-खुशी घर से चले और शाम से घूमते हुए निकले तो रात को घर पहुंचे। तब तक रात के खाने का वक्त हो गया था।

माहौल थोड़ा तनावपूर्ण हो गया। पापा गुस्से में थे और उन्होंने हमें काफी डांटा। यह हमारे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। हम रोने लग गए। हमने उन्हें तसल्ली देने की कोशिश की कि हम अपना होमवर्क समय पर खत्म कर लेंगे लेकिन लग रहा था जैसे वे किसी और ही बात पर क्रोधित थे। वह यह कि जिस बात के लिए मां ने मना कर दिया, उसी के लिए हमने पापा से पूछने की हिमाकत कैसे की?

उन्होंने कहा, अगर माता-पिता में से एक ना कह दे तो इसका सीधा सा मतलब होता है कि दूसरे की भी ना है। अपने ही घर-परिवार में आप इस तरह की होशियारी नहीं कर सकते और मैंने उस दिन यह सबक हमेशा के लिए लिया। सबसे बड़ी बात यह कि माता और पिता एक समान हैं। दूसरा प्रसंग वह है, जिसे 'शिवा ट्रॉयोलॉजी' का जनक कहा जा सकता है।

एक टीवी कार्यक्रम के दौरान घर में थोड़ी चर्चा छिड़ गई। यहीं से यह दार्शनिक विचार सवाल बन कर मेरे मन में आया, राक्षस क्या है? बुरी आत्मा क्या है? क्या इनके अस्तित्व के पीछे कोई उद्देश्य है? अब या तो इसे मेरे परिवार का मेरे लिए स्नेह कह लीजिए या उनका मेरे लिए फैसला। मेरे कविता लिखने की नाकाम कोशिशों के साक्षी रहे मेरे परिवार ने मुझे प्रोत्साहित किया कि इस बार मैं अपने विचारों को लिख लूं। परन्तु मैं पूर्णत: आश्वस्त नहीं था।

मेरी बड़ी बहन भावना और भाई आशीष ने इस बारे में मुझसे बात की। भावना दीदी ने मुझसे कहा,'मैं जब तक किसी काम की कोशिश ही नहीं करूंगा तो मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं यह नहीं कर सकता? मुझे किसी और को प्रभावित करने के लिए नहीं लिखना था बल्कि अपने ही विचारों को पन्ने पर उतार कर अपने परिवार के साथ साझा करना था, जो मेरी लेखनी पर कोई निर्णय तो करने वाले थे नहीं। ऐसे में लेखनी की गुणवत्ता की परवाह किसे थी?

बस लिखना शुरू करना था। यह मेरे जीवन का दूसरा पाठ था। कुछ भी करने में संकोच ना करो। नया प्रयास करने से पहले विफलता का डर खुद पर क्यों हावी होने दें? और, सबसे बड़ी बात यह कि जब आप अपने लिए ही करने वाले हैं तो परवाह क्या करनी कि दूसरे क्या सोचेंगे? तीसरा किस्सा उस समय का है, जब शिवा ट्रायोलॉजी की दूसरी किताब 'द सीक्रेट ऑफ नागाज' बाजार में आने वाली थी। भगवान की कृपा से इस श्रृंखला की पहली किताब 'इममोर्टल्स ऑफ मेलूहा' काफी अच्छी चल रही थी। दूसरी किताब के लिए हो रही प्री बुकिंग से मेरे मन में यह विश्वास पनप चुका था कि यह भी सफल होगी। तब तक, मैं नौकरी भी कर रहा था और लेखन धर्म भी।

मैं एक जीवन बीमा कंपनी में वरिष्ठ प्रबंधन समिति का सदस्य था। इस नौकरी के चलते मैं छह दिन तो ऑफिस में व्यस्त रहता था और खाली समय में अपनी किताबें लिखता और प्रचार करता। मैं दिन-रात काम कर रहा था। परन्तु उस वक्त तक मैं नौकरी छोडऩे के बारे में ठीक से तय नहीं कर पा रहा था जबकि मेरे रॉयल्टी चेक की राशि मेरे वेतन से कहीं अधिक हो चुकी थी। मैं बहुत अधिक संपन्न परिवार का नहीं हूं इसलिए अपने करियर को लेकर किसी तरह का गैर जिम्मेदाराना कदम नहीं उठा सकता था। उन्हीं दिनों मैं और मेरी पत्नी एक बेटे के माता-पिता बने।

 उसके पालन-पोषण के लिए मेरी पत्नी ने अपने काम से कुछ समय का अवकाश ले लिया। तब मेरी पत्नी प्रीति और मेरे बड़े भाई अनीष ने मुझे समझाया कि मैं अपने आपको पूर्णत: लेखन के लिए समर्पित करने का जोखिम लेने से डर रहा हूं। अनीष दा ने  कहा, नौकरी तो मैं कभी भी दोबारा कर सकता हूं पर बतौर लेखक करियर बनाने का यही सुनहरा अवसर था। और, मेरा ऐसा करना सफल रहा तो मंै अपने मन मुताबिक जिंदगी जी सकूंगा।

प्रीति ने मुझे एक बहुत ही अच्छी बात कही कि अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियों के साथ-साथ कुछ जिम्मेदारी मेरी अपने प्रति भी है। अपने सपने सच करने की। जीवन अधिक सार्थक करने की। प्रीति ने कहा, बहुत से लोगों को ऐसे अवसर नहीं मिलते। सौभाग्य से मुझे यह अवसर मिला है तो मुझे इसका लाभ पूरी तरह उठाना चाहिए।

 मैं ऐसा नहीं करूंगा तो यह अपनी जिम्मेदारी से मुख मोड़ लेना होगा इसलिए मैंने नौकरी छोड़ दी। यहां जो मैंने सबक सीखा, वह यह कि हमारी अपने परिजनों और परिवार के प्रति जिम्मेदारी बनती है, इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन हमारी स्वयं के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी बनती है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए।

मॉडर्न इंडियन अमीश

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