एनडीए के कोविंद

Shankar Sharma

Publish: Jun, 20 2017 03:57:00 (IST)

Opinion
एनडीए के कोविंद

बिहार के राज्यपाल और दलित नेता रामनाथ कोविंद को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर सब राजनीतिक दलों को चौंका दिया

हमेशा की तरह उम्मीद तो सभी को पहले से ही थी कि मोदी कोई अप्रत्याशित नाम सामने लाएंगे। लेकिन यह नाम कोविंद का हो सकता है, यह तो शायद उनकी पार्टी में भी किसी ने नहीं सोचा होगा। अपने आपको राजनीति और राजनेताओं की नब्ज पकडऩे में माहिर मानने वाला मीडिया भी फिर एक बार गच्चा खा गया। पिछले दिनों विपक्ष की इस मुद्दे पर एकजुटता की कोशिशों को देखते हुए उन्होंने जो दलित कार्ड खेला है उससे विपक्ष के प्रयासों को भी बड़ा झटका लगा है।

आगामी विधानसभा चुनावों और फिर 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर कोई भी दलितों को नाराज करने की हिम्मत जुटा नहीं पाएगा। फिर कोविंद को लम्बा राजनीतिक अनुभव है। तकरीबन पांच दशकों का उन्हें वकालत का अनुभव है। कानपुर के दलित परिवार में 1 अक्टूबर 1945 को जन्मे रामनाथ कोविंद ने कानपुर विश्वविद्यालय से वाणिज्य और विधि स्नातक की डिग्री हासिल की। 1971 में वकालत शुरू की और दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बतौर सरकारी वकील सेवाएं दी।

1994 में पहली बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। 12 साल तक उच्च सदन के सदस्य रहे। वे कई संसदीय समितियों के सदस्य रहे। इनमें अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता, कानून एवं न्याय तथा गृह मामलों की समितियां प्रमुख हैं। वे राज्य सभा संसदीय समिति के अध्यक्ष भी रहे।

कोविंद भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पार्टी के दलित मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे हैं। कुल मिलाकर आम लोगों के लिए रामनाथ कोविंद नया नाम हो सकता है लेकिन राजनीतिक हलकों में वे अपरिचित नहीं हैं। कोविंद का नाम तय होने के साथ ही एनडीए ने विपक्ष का सहयोग हासिल करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को फोन कर सूचित किया तथा कोविंद को समर्थन देने की बात कही। हालांकि अभी तक किसी विपक्षी दल ने इस मसले पर अपना रुख जाहिर नहीं किया है लेकिन मोदी ने कोविंद को आगे कर जो बेदाग दलित तीर चलाया है वह निशाने पर बैठता जरूर लग रहा है।

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