आखिर क्यों है हमें खुशियों से परहेज?

Shankar Sharma

Publish: Jun, 20 2017 04:00:00 (IST)

Opinion
आखिर क्यों है हमें खुशियों से परहेज?

खुशियों के सूचकांक पर जब हमारे देश का नंबर देखते हैं तो निराशा हाथ लगती है। शिक्षा व चिकित्सा संस्थानों की बढ़ती संख्या के बावजूद हमारे यहां जीवनशैली संबंधी बीमारियां बढ़ रहीं हैं

डॉ.अशोक पानगडिय़ा
खुशियों के सूचकांक पर जब हमारे देश का नंबर देखते हैं तो निराशा हाथ लगती है। शिक्षा व चिकित्सा संस्थानों की बढ़ती संख्या के बावजूद हमारे यहां जीवनशैली संबंधी बीमारियां बढ़ रहीं हैं। परपीडऩ व नकारात्मक सोच के साथ कोई खुशी मिले तो भी वह शरीर को बीमारियों का घर बनाने के लिए काफी है। ऐसे में यही है सवाल कि...

लाख टके का सवाल है कि आर्थिक विकास, तकनीकी और वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद भारत को खुशियों से परहेज क्यों है? अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के आंकड़ों की मानें तो हमारा देश 'खुशियों के सूचकांक' पर कहीं नजर नहीं आता। हमारे यहां शिक्षा व चिकित्सा संस्थानों की बढ़ती संख्या के बावजूद जीवनशैली संबंधी बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। धार्मिक व आध्यात्मिक गुरू और उनके ढेरों अनुयायी मिल कर भी इतनी सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न नहीं कर सके हैं कि लोगों की खुशियोंं में इजाफा कर सकें। भारतीय बहुत बुद्धिमान हैं यह अमरीका के दो पूर्व राष्ट्रपति भी स्वीकार कर चुके हैं।

सुख-चैन में कमी और बढ़ती बीमारियों को देखते हुए समस्या के समाधान की जरूरत है। न्यूरोलॉजी की प्रैक्टिस के दौरान भी मैं इसी सवाल से  बेचैन रहता था। मुझे मस्तिष्क के मैकलिएन मॉडल के अध्ययन से समझने में कुछ सहायता मिली। मैकलिएन ने अपने मॉडल में दिमाग को 'तीन तरफा दिमाग' बताया है।

यह जिस तंत्रिका तंत्र से बना है वह एक तरह से मानव का विकास दर्शाती हैं। सबसे पहला रेप्टाइल यानी रेंगने वाला दिमाग। दूसरा भावुक व तीसरा तार्किक रूप से अत्याधुनिक नव स्तनपायी या नया दिमाग। ये आपस में जुड़े हैं पर हरेक का अपना अलग जैविक संघटन ऐसे कम्प्यूटराइज्ड है जैसे उसमें अद्भुत आनुवांशिक प्रोग्रामिंग की गई हो। मानव व्यवहार के सभी कृत्य उसके बड़े से दिमाग के इन तीन घटकों के विशेष लक्षणों से ही उपजते हैं। सबसे पुराना यानी रेंगने वाले प्राणी जैसा दिमागी हिस्सा  घरेलू सारसंभाल वाली गतिविधियों में लिप्त रहता है। दूसरे स्तर का दिमाग  परिवार व समाज के रक्षण के लिए आवश्यक भावनाओं जैसे  लालच, स्वार्थ, ईष्र्या,  प्यार-मोहब्बत, नफरत, डर, खुशी आदि के लिए उत्तरदायी है।

सर्वाधिक विकसित दिमागी हिस्सा ज्ञान संबंधी है। लौकिक व अत्याधुनिक संदर्भ के चलते इस प्रकार के प्रभुत्वयुक्त दिमाग वाले लोग बुद्धिजीवी व आध्यात्मिक विचारों के होते हैं। नव विकसित या यूं कहें जितना अधिक क्रमिक विकसित दिमाग होगा, उस व्यक्ति के दयालु, नि:स्वार्थी व आध्यात्मिक होने के अवसर अधिक बढेंगे। यह स्वरूप स्थिरता और खुशियां लाता है। दिमाग का भावना प्रधान हिस्सा 'अमिगडाला' पिछली यादों को भविष्य की कल्पनाओं से जोड़ कर देखता है।

एक तरह से यह दिमागी सर्किट का वह स्विच  है जो एक क्लिक पर दिमाग के निचले, मंझले और उच्च यानी कि नव विकसित हिस्से के बीच ऊर्जा प्रवाहित करता है। दिमाग का उच्च स्तरीय विकसित हिस्सा 'शांति' की भावना को सर्वोपरि रखते हुए शरीर के लिए 'सबसे अच्छा डॉक्टर' साबित होता है। यह शरीर को जीवन शैली का गुलाम बनने से रोक बीमारियों का खतरा कम करता है। यह व्यक्ति के मानस को इस कदर स्थिर कर देता है कि वह शांत, दयालु भाव के साथ आध्यात्मिक अवस्था पा सके। यही आंतरिक खुशियों की शुरुआत है, जहां से स्थायी सुख का मार्ग प्रशस्त होता है।

इसके विपरीत सामाजिक या घरेलू नकारात्मक सोच की प्रभुता वाला दिमाग व्यक्ति की सकारात्मक सोच का दमन करते हुए उसे लगातार और स्थायी  तनाव  की ओर धकेलता रहता है। आगे चलकर इससे शरीर बीमारियों का घर बन  जाता है और व्यक्ति खुश नहीं रह पाता। भारत बौद्धिक तौर पर स्वस्थ मानसिकता वाला देश रहा है। विदेशी आक्रमणों व दासता ने भारतीय मानसिकता को सदियों के लिए विकृत कर दिया।


अस्तित्व बचाने के दबाव में वे ऐसे जीन या आनुवांशिकी की ओर प्रवृत्त हुए कि दिमाग के सकारात्मक हिस्से की जगह नकारात्मकता ने ले ली। आजादी के बाद खुशमिजाज देश की जो उम्मीद जगी उस पर औद्योगिकीकरण, लाइसेंस व इंस्पेक्टर राज के भ्रष्टाचार का ऐसा जाल बुना कि समाज में नफरत, लोभ, ईष्र्या जैसी नकारात्मक भावनाएं घर कर गईं। इसी से आज हमारा समाज दुखी है। खुशियों से दूर होते भारतीयों की प्रवृत्ति की एक और वजह अत्याधुनिक व्यक्तित्व निर्माण भी है, जिसका आईक्यू या ईक्यू से कोई सरोकार नहीं है।

इसकी परिणति यह हुई कि आज हमारे संस्थान, ऑफिसों और क्लबों में आपसी वैमनस्यता, साजिश, अविश्वास जैसी नकारात्मक भावनाएं पसरी पड़ी हैं। मानसिक रोगों को शरीर में घर करने के लिए इससे अधिक और क्या चाहिए? यह सत्य है कि हम अपने आप से खुश नहीं हैं।

आत्म विश्लेषण में ना हमें अपनी तरक्की दिखाई देती है और ना हम खुश हो पाते हैं। लेकिन अगर पड़ोसी या हमारा दोस्त कहीं पीछे रह गया कुछ हासिल नहीं कर पाया तो उसमें बड़ी खुशी होती है। भारत को खुशियों के सूचकांक में जगह दिलाने वाले ज्यादातर घटक गायब हैं तो दूसरी ओर जिस चीज में भारतीयों को सर्वाधिक खुशाी मिलती है-वह है परपीडऩ यानी दूसरों को तकलीफ  पहुंचाना।

ऐसा करते वक्त दिमाग में जो रासायनिक क्रिया होती है, वह क्षणिक सुख देती है लेकिन चारों ओर एक अस्वस्थ माहौल बना देती है। मुझे खेद के साथ यह कहना पड़ रहा है कि इस तरह की नकारात्मक सोच के साथ मिलने वाली खुशी और आत्म मुग्धता जैसे मनोविकार केवल बीमारियां ही बढ़ाएंगे।

Rajasthan Patrika Live TV

1
Ad Block is Banned