मिलेगी सजा या बनेगा सियासी मुद्दा?

Mukesh Sharma

Publish: Apr, 20 2017 01:22:00 (IST)

Opinion
मिलेगी सजा या बनेगा सियासी मुद्दा?

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित बाबरी ढांचा गिराए जाने की आपराधिक साजिश के आरोप में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित बाबरी ढांचा गिराए जाने की आपराधिक साजिश के आरोप में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और केंद्रीय मंत्री उमा भारती सहित 13 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। इस मामले में  केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के रुख में परिवर्तन आया है। सीबीआई ने कोर्ट में अपील करके मांग की थी कि आडवाणी सहित 21 अभियुक्तों के खिलाफ विवादित ढांचा गिराए जाने के षडयंत्र और अन्य धाराओं में मुकदमा चलना चाहिए। कोर्ट ने आपराधिक षडयंत्र रचने का मुकदमा चलाने का आदेश दिया है।


 आडवाणी सहित कई अन्यों लोगों पर भड़काऊ भाषण देने का मामला अभी लंबित है। कुछ समय से आडवाणी के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने  के कयास लगाए जाते रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) आज जिस स्तर पर है, वहां तक पहुंचाने में आडवाणी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आडवाणी के पार्टी में योगदान को देखते हुए ही यह कयास लगाए जा रहे थे कि उन्हें भाजपा राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना सकती है।   गौरतलब है कि आडवाणी ने लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने का विरोध किया था।


भले ही आज मोदी और आडवाणी के संबंध अधिक मधुर नहीं हैं लेकिन आडवाणी, मोदी के राजनीतिक गुरु और संरक्षक की भूमिका में रहे हैं। इसलिए भी यह माना जा रहा था कि आडवाणी का पार्टी में योगदान, उनकी वरिष्ठता और प्रधानमंत्री मोदी के साथ पुराने संबंधों को देखते हुए वे राष्ट्रपति पद के चुनाव की रेस में शामिल हो सकते हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना था कि मोदी की कार्यशैली को देखते हुए लगता नहीं कि वे आडवाणी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का जोखिम लेंगे।


 आडवाणी के खिलाफ विवादित ढांचा गिराने की साजिश का मुकदमा चलाने के कोर्ट के आदेश का असर अब उनकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पर पड़ सकता है। माना जा रहा है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद वे राष्ट्रपति पद की रेस से लगभग बाहर हो जाएंगे। पार्टी में उनके विरोधी इस फैसले को ढाल बनाकर उनकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए अड़चने पैदा करेंगे। कानूनी जानकारों का मानना है कि राष्ट्रपति पद की  उम्मीदवारी में इस फैसले से कोई कानूनी दिक्कत नहीं होगी। वैसे भी संविधान का मूल नियम भी यही कहता है कि हर व्यक्ति कानून के सामने तब तक निर्दोष है जब तक की वह अदालत द्वारा दोषी करार नहीं दिया जाता। आडवाणी अभी दोषी करार नहीं दिए गए हैं इसलिए वह कानूनी तौर पर तो राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के योग्य हो सकते हैं पर यह मामला  थोड़ा अलग है। भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां सभी संप्रदाय समान हैं।


 ऐसे में यदि किसी के खिलाफ भड़काऊ भाषण और विवादित धार्मिक ढांचा गिराने की साजिश का मामला हो तो वह धर्मनिरपेक्षता के विपरीत बात हो जाती है। साजिश का आरोप लगने के बाद व्यक्ति अन्य लोगों के कार्य और व्यवहार के लिए भी जिम्मेदार हो जाता है। ऐसे में दायरा व्यापक हो जाता है। सवाल यदि राष्ट्रपति पद के चुनाव का है तो यहां नैतिकता का सवाल अहम हो जाता है क्योंकि ऐसे पद के लिए उन लोगों को चुनाव नहीं लडऩा चाहिए जिनके खिलाफ दो समुदायों में नफरत फैलाने वाले भड़काऊ भाषण व धार्मिक ढांचा गिराने की साजिश का आरोप हो।


राष्ट्रपति पद की गरिमा है और इन आरोपों के साथ उस पद के लिए चुनाव लडऩा नैतिकता के खिलाफ है। मामले में शिकायती कोई व्यक्ति नहीं है बल्कि सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने जब साजिश के आरोपों के मामले में भी मुकदमा चलाने की बात कही है तो अब राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के कयास पर विराम लग जाना चाहिए। आदेश में उमा भारती का नाम भी है और वह केंद्र में मंत्री हैं। उन्हें भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना पड़ सकता है। जहां तक राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का सवाल है तो उनके खिलाफ राज्यपालपद पर रहते हुए अभी मुकदमा नहीं चल सकता क्योंकि संविधान के तहत राज्यपाल को मुकदमे से छूट मिली हुई है।


हां, उनके पद से हटने पर मुकदमा चलाया जा सकता है। यहां भी मामला नैतिकता का है। कल्याण सिंह के खिलाफ नई धाराएं लगाई गई हैं और ऐसे में उन पर दबाव पड़ सकता है कि नैतिकता के आधार पर वह इस्तीफा दे दें लेकिन उनके खिलाफ पहले से भड़काऊ भाषण का मामला लंबित था। फिर भी, वे राज्यपाल बने।


 हालांकि यह सब कल्याण सिंह पर निर्भर करता है कि वे नैतिकता के दबाव में इस्तीफा देकर मुकदमा का सामना करना चाहते हैं या अपने पद पर बने रहते हैं। इस मामले की अब रोजाना सुनवाई होगी और दो साल में इस पर फैसला करना होगा यानी यह फैसला 2019 के लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान आ सकता है। भाजपा ने हाल ही मंदिर मुद्दे को फिर से उठाया है और उसके घोषणा पत्र में भी यह मुद्दा शामिल है।  संभव है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में राम मंदिर बड़ा चुनावी मुद्दा बन जाए।  नीरजा  चौधरी  वरिष्ठ पत्रकार

   

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