चार धाम यात्रा: ऐसी है गंगोत्री से भोजवासा की यात्रा

Sunil Sharma

Publish: May, 10 2017 01:22:00 (IST)

Pilgrimage Trips
चार धाम यात्रा: ऐसी है गंगोत्री से भोजवासा की यात्रा

गौमुख तक  जाने के लिए रोज 150 यात्रियों को अनुमति दी जाती है, लेकिन पहाड़ी रास्तों में कोई नजर नहीं आता है

गंगोत्री धाम की कहानी सुनाने के बाद मां गंगा ने सिर पर हाथ फेरा और कहा, अब जाओ गौमुख। गंगोत्री धाम से 18 किलोमीटर का कठिन और दुर्गम रास्ता है। जरा सी चूक, बड़ा हादसा कर सकती है, सावधानी बरतना मैं साथ-साथ हूं। बस, फिर क्या था। उत्तराखंड वन विभाग में पंजीयन कराने के बाद रवाना हो गए गौमुख की ओर। सोचा ना था ना ही कभी कल्पना की थी। बस दिमाग में यह था कि पहाड़ों से होकर गौमुख तक जाया जा सकता है। गौमुख के इस 18 किलोमीटर के सफर में सिर्फ गंगा के पहाड़ों से गिरते झरने के अलावा कुछ नहीं था। दूर तक इंसान तक नजर नहीं आता था। कहने को तो गौमुख तक  जाने के लिए रोज 150 यात्रियों को अनुमति दी जाती है, लेकिन पहाड़ी रास्तों में कोई नजर नहीं आता है। गंगा मैया के विश्वास के साथ आगे बढ़ चले। समूचे रास्ते कोई ठहराव स्थल तक नहीं था।

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रवाना होने से पहले बताया गया कि चीड़वासा है नौ किलोमीटर पर और 14 किलोमीटर पर भोजवासा। वहां से चार किलोमीटर आगे गौमुख। जब रवाना हुए और आगे बढ़ते गए तो लगने लगा कि पहले के जमाने में कैसे लोग गौमुख तक जाया करते थे, जबकि आज भी इतना कठिन रास्ता है। पूरे रास्ते में दर्जन भर स्थान तो ऐसे थे कि जरा सी चूक सीधे गहरी खाई में बहती गंगा में सदा के लिए समा ले। गंगोत्री से भोजवासा का सफर पार करने में नौ घंटे से ज्यादा का समय लग गया।

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इस नौ किलोमीटर की सचित्र कहानी भी आम आदमी की कल्पनाओं से परे है। रास्ते में कब बारिश आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। कहीं सतही रास्ता, कहीेें ऊबड़-खाबड़ पत्थरीले रास्ते। कहीं ऊंची चढ़ाई तो कहीं गहरी उतराई। कभी चढ़ते और कभी उतरते। चलते समय हाथ में लाठी, जो कि जीवनदायिनी। लाठी ठेक-ठेक कर आगे बढ़ते। हाथों में छाले पड़ गए। पांवों की हालत खराब। पिंडलियां पत्थर से भारी हो चुकी थी। पांवों के तलवे पूरी तरह गल चुके थे। बारिश की बूंदें शुरू हो चुकी। बारिश के बाद यह दुर्गम रास्ता दुर्गमतम हो चुका था। पांव किधर रख रहे थे और किधर गिर रहा था। जरा सा ही संतुलन बिगड़ते ही सब कुछ खत्म।

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बीच-बीच में धूप दिखती, उसके बाद चलती तेज तूफानी हवाओं ने जान निकाल दी। ऑक्सीजन कम होने लगी और सांसें फूलने लगी। बस इंतजार इस बात का था िक चीड़वासा आ जाए। आखिरकार छह घंटे के कठिन सफर के बाद यह भी आ गया, लेकिन ठहराव के नाम पर कुछ नहीं। सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। वहां सिर्फ थे चीड़ और देवदार के 1200 पेड़। चाय के नाम पर एक दुकान और आबादी के नाम पर इंसान नहीं। थी तो सिर्फ एक वन विभाग की चौकी। थोड़ी राहत की सांस लेने के बाद इस उम्मीद में आगे बढ़े कि भोजवासा आएगा। परन्तु वो सिर्फ कोरी कल्पना ही थी।

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चले जा रहे थे और भोजवासा आने का नाम ही नहीं ले रहा था। चीड़वासा से भोजवासा तक का पांच किलोमीटर का सफर किसी दूसरे जीवन के समान ही था, लेकिन मां गंगा ने कहा था कि मैं इंतजार कर रही हूं, बस यही विश्वास था जो गौमुख की ओर ले जा रहा था। कई जगह ऐसी थी जहां एक कदम आगे और एक कदम पीछे करके चला जा रहा था, जरा सा ही इधर-उधर होते तो सब खत्म था। ऐसा नहीं था कि डर नहीं लग रहा था, बेहद डर था। कई जगह तो ऐसी थी जहां पंगड़ड़़ी तक नजर नहीं आ रही थी। पहाड़ों की छोटी-बड़ी शिलाओं ने रास्ता ही गुम कर दिया था। लग रहा था कि कहीं जंगल में भटक गए तो? पर, मां को कुछ और ही मंजूर था।


नौ घंटे को दुर्गम सफर पार करके जैसे-तैसे भोजवासा पहुंच गए, तब तक देर शाम हो चुकी थी। अचरज से कम नहीं था कि यहां भी कोई आश्रम हो सकता है। जहां ठहरा जा सकता है। वहां गए तो देखकर दंग रह गए। पीने के लिए गर्म पानी, गर्मागर्म चाय और ताजा भोजन। इस तरह भी हो सकता है, सोच और समझ से बाहर था। पूरी तरह थक चुके थे, खाना खाते ही जबरदस्त नींद आई, जो सुबह चार बजे जाकर खुली।  अलसुबह उठते ही नित्यकर्म से निवृत्त होकर बढ़ गए गौमुख की ओर ।

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यहां से यह चार किलोमीटर का सफर किसी दूसरी जिन्दगी के समान ही थी। गौमुख से 500 मीटर पहले ही यात्रियों को रोक दिया जाता है पर जो जाते हैं वे स्वयं के जोखिम पर। 500 मीटर के इस रास्ते में ना पंगडड़़ी है ना ही कोई रास्ता बताने वाला। मां की कृपा से ही चले जाओ। दो घंटे का सफर तय करके गौमुख तक अंतत: पहंच गए, लेकिन दिन में ही अंधेरा हो चुका था और बारिश तेज हो गई थी। यहां ग्लेशियर कब पिघल कर गिर जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता था, डर था और घबराहट भी।

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गौमुख पर एक छोटी सी गुफा सी निकलती धारा है, जिसे गौमुख कहा जाता है, इसे ही मां गंगा का उद्गम स्थल कहते हैं। पूजा-अर्चना के बाद यहां से 12 घंटे का सफर तय करके गंगोत्री धाम पहुंचे, कैसे पहुंचे, खुद को भी नहीं पता, बस चले जा रहे थे। हाथ-पांव पूरी तरह जवाब दे चुके थे। जब गंगोत्री धाम पर मां गंगा के मंदिर के सामने पहुंचे तो मां गंगा मुस्कुरा रही थी, कह रही थी, अब इस धाम की यात्रा पूरी हो गई।


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