कैलाश मानसरोवर से जुड़े हैं ये राज, इन्हीं के कारण बना सबसे बड़ा तीर्थस्थल

Sunil Sharma

Publish: Feb, 18 2017 12:13:00 (IST)

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कैलाश मानसरोवर से जुड़े हैं ये राज, इन्हीं के कारण बना सबसे बड़ा तीर्थस्थल

कैलाश मानसरोवर को हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में एक माना जाता है

कैलाश मानसरोवर को हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में एक माना जाता है। किंवदंती है कि यहां साक्षात भगवान शिव निवास करते हैं, उन्हीं के दर्शनों के लिए हजारों-लाखों शिवभक्त हर वर्ष यहां आते हैं। माना जाता है कि यही पर आदि शंकराचार्य ने भी अपने शरीर का त्याग किया था। यही प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया था।

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तिब्बत में स्थित पर्वत श्रेणी कैलाश के पश्चिम में मानसरोवर झील तथा दक्षिण में रक्षातल झील है। यहां से ब्रह्मपुत्र, सिंधु तथा सतलुज सहित कई पवित्र नदियों का उद्गम होता है। इस पूरे खंड को मानसखंड भी कहा जाता है। कैलाश को गणपर्वत और रजतगिरी भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार शास्त्रों में बताया गया मेरू पर्वत भी इसी को कहा जाता है।

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रावण ने की थी तपस्या

रामायण की कथा के अनुसार यहां राक्षसराज रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कड़ी तपस्या की थी। तपस्या के असफल होने पर उसने क्रोधित होकर कैलाश पर्वत को अपने हाथों पर उठा लिया था, जिस पर स्वयं महादेव ने उसका मान-मर्दन किया था। भस्मासुर ने भी यही तप कर किसी को भी भस्म कर देने वाला अमोघ वरदान प्राप्त किया था।

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पर्वतों से बने षोड़शदल कमल के बीच में विराजमान है कैलाश पर्वत

कैलाश पर्वतमाला कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई है और ल्हा चू और झोंग चू के बीच कैलाश पर्वत है जिसके उत्तरी शिखर का नाम कैलाश है। इस शिखर की आकृति विराट् शिवलिंग की तरह है। पर्वतों से बने षोडशदल कमल के मध्य यह स्थित है। यह सदैव बर्फ से आच्छादित रहता है। इसकी परिक्रमा का महत्व कहा गया है।

कैलाश की परिक्रमा से दूर हो जाते हैं सब पाप
प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है कि हर आदमी को जीवन में कम से कम एक बार अवश्य कैलाश पर्वत जाना चाहिए। यहां आने से सभी तरह से पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

तारचेन से आरंभ होती है परिक्रमा
कैलाश पर्वत की परिक्रमा तारचेन से आरंभ होकर वापस यहीं आकर समाप्त होती है। यात्रा में लगभग दो मास का समय लगता है जो बसंत के समय आरंभ होकर ज्येष्ठ मास में समाप्त हो जाती है। परिक्रमा के दौरान तकलाकोट आता है, इससे 40 किमी (25 मील) पर मंधाता पर्वत स्थित गुर्लला का दर्रा 4,938 मीटर (16,200 फुट) की ऊँचाई पर है। इसके मध्य में पहले बाइर्ं ओर मानसरोवर और दाइर्ं ओर राक्षस ताल है। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है जहाँ गर्म पानी के झरने हैं। इन झरनों के आसपास चूनखड़ी के टीले हैं।

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