रेलवे को राजस्व की दरकार, बीमा की नहीं फिक्र

Piyushkant Chaturvedi

Publish: Apr, 21 2017 01:03:00 (IST)

Raigarh, Chhattisgarh, India
रेलवे को राजस्व की दरकार, बीमा की नहीं फिक्र

. रेलवे स्टेशन के बाइक स्टैंड में खड़ी वाहनों के साथ अगर कोई अनहोनी होती है तो उसका खामियाजा रेलवे नहीं बल्कि वाहन चालक को खुद उठाना पड़ेगा। क्योकि  स्थानीय बाइक स्टैंड का बीमा नहीं है। जबकि प्रत्येक बाइक स्टैंड का बीमा होना अनिवार्य है।

रायगढ़. रेलवे स्टेशन के बाइक स्टैंड में खड़ी वाहनों के साथ अगर कोई अनहोनी होती है तो उसका खामियाजा रेलवे नहीं बल्कि वाहन चालक को खुद उठाना पड़ेगा। क्योकि  स्थानीय बाइक स्टैंड का बीमा नहीं है। जबकि प्रत्येक बाइक स्टैंड का बीमा होना अनिवार्य है। रायपुर स्टेशन के पार्किंग में लगी आग व सैकड़ों बाइक के खाक होने के बाद यह सवाल उठ रहे हैं।
अब यदि आंकड़ों की बात करें तो रायगढ़ रेलवे स्टेशन के वाहन पार्किंग स्टैंड का ठेका साल दर साल बढ़ता गया। 1990 में जो ठेका 33 हजार रुपए, तीन साल के लिए था। अब वो बढ़कर एक करोड़ 35 लाख रुपए हो गया है। जिसे कल्पना से अधिक बताया जा रहा है।
मामला रेलवे के भारी-भरकम राजस्व से जुड़ा हुआ है तो अधिकारी भी इसपर नजर जमाए रहते हैं। पर स्थानीय स्टैंड से करोड़ों रुपए का राजस्व प्राप्त करने वाले रेल के अधिकारी स्थानीय स्टैंड के बीमा कराने को लेकर उदासीन है। यह सवाल इनदिनों इसलिए भी उठ रहा है कि कुछ दिन पहले रायपुर रेलवे स्टेशन के पार्किंग में खड़ी 200 से अधिक बाइक जल कर खाक हो गई। बाद में मालूम हुआ कि उक्त बाइक स्टैंड का बीमा ही नहीं था। जबकि ऐसे किसी स्थान का जब व्यवसायिक उपयोग होता है तो उसका बीमा अनिवार्य है। पर रेल अधिकारी बीमा कराने को लेकर उदासीन है। ऐसे में, किसी अनहोनी की स्थिति में वाहन चालक को ही इसका खामियाजा उठाने की बात कही जा रही है।

मापदंड पर खरा नहीं- जानकारों की माने तो किसी स्टैंड के बीमा होने के लिए उसकी तय क्षमता के अनुसार वाहनों की पार्किंग, वाहनों में एक तय दूरी, शेड निर्माण, अग्निशमन यंंत्र व अन्य सुविधाएं होनी चाहिए। पर स्थानीय स्टैंड में जगह के अभाव के बीच वाहनों की ज्यादा भीड़ देखी जाती है। जिसकी वजह से बीमा के मापदंड पर उक्त स्टैंड खरा नहीं उतरता है। वाहन चालकों की माने तो डिवीजन के आला अधिकारी का पूरा ध्यान सिर्फ राजस्व वसूली पर रहता है। अगर राजस्व के आंकड़े पर गौर करते तो ढाई दशक में टेंडर की राशि में करीब 400 गुना की बढ़ोतरी की गई है। पर सुविधाओं का अभाव है।

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