धन्य हैं उज्जैनवासी, जहां दर्शन देने स्वयं निकलते हैं महाकालेश्वर, दी जाती है तोपों से सलामी

Raipur, Chhattisgarh, India
धन्य हैं उज्जैनवासी, जहां दर्शन देने स्वयं निकलते हैं महाकालेश्वर, दी जाती है तोपों से सलामी

श्रावण-भादे मास में महाकालेश्वर भगवान हर सोमवार को शाम करीब 4 बजे विभिन्न रूपों में विविध वाहनों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं।

रायपुर. श्रावण मास में महाकालेश्वर भगवान हर सोमवार को शाम करीब 4 बजे विभिन्न रूपों में विविध वाहनों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं। भक्त इन रूपों की एक झलक पाकर ही निहाल हो जाते हैं। शहर भ्रमण के बाद रात में महाकाल वापस मंदिर लौटते हैं। द्वितीय सोमवार को महाकालेश्वर चंद्रमौलिश्वर रूप में दर्शन देते हैं।

माना जाता है कि  महाकाल की सवारी इसलिए निकाली जाती है ताकि भगवान हर भक्त तक सभी रूपों में पहुंच सकें। सवारी से पहले पुजारी मुखौटे सम्मुख रख महाकाल से इनमें विराजित होने का आह्वान करते हैं। ऐसा इसलिए ताकि हर रूप में भक्त भगवान के दर्शन कर सके। खासकर वे जो किसी कारण से मंदिर नहीं आ सकते। पालकी में भगवान के नगर भ्रमण की परंपरा अनादिकाल से मानी गई है। जब तक सवारी लौटकर नहीं आती, महाकाल की संध्या आरती नहीं होती। ऐसा माना जाता है कि प्रभु मुखौटे में विराजित हो नगर भ्रमण पर गए हैं।
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उज्जैन में भगवान शिव राजा के रूप में विराजमान है। श्रावण मास में वे अपनी प्रजा का हालचाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। प्रजा अपने राजा से मिलने के लिए इस कदर बेताब होती है कि शहर के चौराहे-चौराहे पर स्वागत की विशेष तैयारी की जाती है। शाम चार बजे राजकीय ठाट-बाट और वैभव के साथ राजा महाकाल विशेष रूप से फूलों से सुसज्जित चाँदी की पालकी में सवार होते हैं। जैसे ही राजा महाकाल पालकी में विराजमान होते हैं। ठंडी हवा के एक शीतल झोंके से या हल्की फुहारों से प्रकृति भी उनका भीना स्वागत करती है। महाकालेश्वर मंदिर का समूचा परिसर जय-जयकारों से गूँज उठता है।

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हाथी, घोड़े, चंवर डूलाते, सरकारी बैंड की दिल धड़काती धुन, शहर के प्रतिष्ठित गणमान्य नागरिक, आम जन की श्रद्धा का उमड़ता सैलाब, बिल्वपत्र की विशेष रूप से बनी माला, झाँझ-मंजीरे नगाड़ों के साथ होता अनवरत कीर्तन और अपने राजा को देख भर लेने की विकलता के साथ दर्शन करने वालों का मन भाव-विभोर हो जाता है। राजा महाकाल सबसे मिलते हैं। सबको दर्शन देते हैं।

महाकाल करते हैं क्षिप्रा का आचमन
सवारी का सबसे खूबसूरत दृश्य क्षिप्रा नदी के किनारे देखने को मिलता है, जब नदी के दूसरे छोर से संत-महात्मा भव्य आरती करते हैं और विशेष तोप की सलामी के बीच राजा महाकाल क्षिप्रा का आचमन करते हैं। सवारी के साथ पधारे गजराज अपनी सुड़ को ऊँची कर राजा के सम्मान में हर्ष व्यक्त करते हैं। पवित्र मंत्रोच्चार के साथ सवारी वापस मंदिर पहुंचती है। शहरवासी दिन भर अपने राजा के सम्मान में किया व्रत सवारी के दर्शन के बाद ही खोलते हैं। देश के अलग-अलग प्रांतों से लोग सोमवार की इस दिव्य सवारी के दर्शन करने आते हैं और मनचाहा वरदान लेकर जाते हैं।

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