सत्य की साधना से ही होती है ईश्वर की आराधना

Sunil Sharma

Publish: Apr, 08 2017 01:09:00 (IST)

Religion and Spirituality
सत्य की साधना से ही होती है ईश्वर की आराधना

सत्य एक व्रत है, जिसकी साधना से जीवन का कल्याण होता है

सत्य की शक्ति से तात्पर्य ईश्वरत्व की शक्ति से है। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र सत्य के प्रति प्रतिष्ठित होकर सभी प्रकार की परीक्षाओं पर खरे उतरे और ईश्वरत्व को प्राप्त किया। रामकृष्ण परमहंस की सत्य साधना तो भगवत् साधना ही थी। सत्य के मार्ग पर अग्रसर होकर आत्मकल्याण और आत्मोत्थान से ही ईश्वर की आराधना संभव है। पुराणों के अनुसार सत्य की समीपता से ही ईश्वर को पाया जा सकता है।

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यह है महाव्रत

सत्य एक व्रत है, जिसकी साधना से जीवन का कल्याण होता है। भगवान महावीर ने सत्य को महाव्रत कहा है। पांच महाव्रतों में सत्य का स्थान महत्वपूर्ण है। सत्य की सम्यकरूपेण प्रतिष्ठा करने वाला कमोबेश सभी व्रतों का पालन करता है। सत्य की अनवरत साधना करने वाला साधक अहिंसक, अस्तेयी अपरिग्रही एवं ब्रह्मचारी भी होगा। जैन धर्म में प्रत्येक श्रमण के लिए मनसा-वाचा-कर्मणा, कृत-कारित-अनुमोदित सत्य सहित सभी महाव्रतों की साधना पर बल दिया गया है। सत्य को परिभाषित करते हुए कहा गया है- 'नानृतं सत्यम्' अर्थात झूठ न बोलना ही सत्य है। सत्य के पथ पर चलने वालों में हरिश्चंद्र, एवं युधिष्ठिर का नाम जगत् प्रसिद्ध है।

ईश्वर, अनादि और अनंत है सत्य
ईश्वर सत्य है, अनादि और अनंत है। वह अजर और अमर है। वह उत्पत्ति और विनाश से परे है। आचार्य शंकर कहते हैं कि 'एकमेवपरमार्थ सत् अद्वयं ब्रह्म' अर्थात ब्रह्म या ईश्वर एक एवं पारमार्थिक सत् है। महात्मा गांधी के अनुसार पूर्णतया सत्यवादी ईश्वर रूप ही है। ईश्वर को सत्य कहें या सत्य को ईश्वर कहें एक ही है। अज्ञानी इसमें भेद करते हैं अर्थात् जो सत्य का साधक है, वही ईश्वर का आराधक है। सत्य ही अशोक (अशोक अर्थात् न शोक इति अशोक) है। तात्पर्य है कि जो शोक नहीं करता वह अशोक है।

जो जितना असत्य के नजदीक होता है वह उतना शोक करता है और जो शोक नहीं करता, सत्य को समझता है वह ईश्वरत्व के उतना नजदीक रहता है, वह तृप्त रहता है, संतुष्ट रहता है और अत्यंत सुखी रहता है। भागवत के अनुसार महाभारत के युद्ध के पश्चात् जब धृतराष्ट्र, गांधारी और विदुर राजमहल छोड़कर चले गए तो युधिष्ठिर को कष्ट हुआ। तब नारद उन्हें समझाते हुए कहते हैं, 'धर्मराज! तुम किसी के लिए शोक मत करो, क्योंकि यह सारा जगत ईश्वर के अधीन है। सारे लोक एवं लोक पाल विवश होकर ईश्वर की ही आज्ञा का पालन कर रहे हैं, वही एक प्राणी को दूसरे से मिलाता है और वही उन्हें अलग करता है, अत: सत्य के प्रतीक धर्मराज आप शोक मत करो।'

अपूर्वशक्ति की प्रतिष्ठा का परिचायक
सत्य और भविष्य कथन-सत्य की साधना करने से अक्षय एवं अपूर्वशक्ति की प्रतिष्ठा होती है। सत्य का आराधक वाणी की सिद्धि इस प्रकार कर लेता है कि उसके मुख से जो निकलता है वह यथार्थ सिद्ध होता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार सत्य की प्रतिष्ठा करने वाला जन्म जन्मान्तर की घटनाओं से अवगत होता है। वह भविष्य वक्ता भी होता है। उसके मुख से जो भी शब्द निकलते हैं, उसकी सिद्धि दृष्टिगोचर होती है।

प्राचीन काल में ऋषि, महर्षि के मुख से अभिशाप या वरदान के शब्द निकलते ही उसकी सिद्धि होती थी। दुष्यंत को जो शब्द ऋषि द्वारा कहे गए थे, वे समय शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुए। कठोषनिषद में सत्य के लिए ही पिता से प्रश्न करने पर नचिकेता को यमराज के यहां जाना पड़ा और वहां तीन वरदान प्राप्त कर सत्य को प्रतिष्ठित किया।

विश्वास के निर्माण का ठोस आधार

सत्यवादी के प्रति सबको अटूट विश्वास होता है क्योंकि सत्यवादी से धोखा खाने का डर नहीं रहता है। सत्य में प्रपं्च नहीं होता है, सत्य में दुराव नहीं होता है। सत्य में सादगी होती है, सत्य में पारदर्शिता होती है। छान्दोग्योपनिषद के अनुसार सत्यकाम जब ऋषि गौतम के आश्रम में अध्ययनार्थ गया तो सर्वप्रथम महर्षि ने जब उसका परिचय पूछा तो उसने कहा मैं सत्य काम जाबालि हूं। मेरी माता का नाम जाबालि है। इसके अतिरिक्त मैं कुछ नहीं जानता।

ऋषि उसके सत्य वचन को सुनकर बड़े प्रभावित हुए और उसे ब्रह्मज्ञान का पात्र समझकर आश्रम में रख लिया। महाभारत के अनुसार जब कौरव सेनापति द्रोणाचार्य को रास्ते से हटाने की बात आई तो उस समय सत्यवादी युधिष्ठिर के वचन पर ही विश्वास किया गया था। अत: यह कहना उपयुक्त है कि सत्य से ही विश्वास बनता है।

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