इबादत के लिए उम्र की पाबंदी तोड़ रख रहे  रोजा

Rishi Sharma

Publish: Jun, 20 2017 12:14:00 (IST)

Shajapur, Madhya Pradesh, India
इबादत के लिए उम्र की पाबंदी तोड़ रख रहे  रोजा

मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा व सबसे लंबा चलने वाला त्यौहार पाक माह रमजान हैं। इस माह में रोजे का खास महत्व होता हैं। रोजा हर बालिग औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े पर फर्ज हैं। रोजेदारों के लिए उम्र की कोई बाधा नहीं हैं। इस्लाम के मुताबिक 10 वर्ष के बाद बच्चों को रोजा फर्ज होता है।

शाजापुर. मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा व सबसे लंबा चलने वाला त्यौहार पाक माह रमजान हैं। इस माह में रोजे का खास महत्व होता हैं। रोजा हर बालिग औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े पर फर्ज हैं। रोजेदारों के लिए उम्र की कोई बाधा नहीं हैं। इस्लाम के मुताबिक 10 वर्ष के बाद बच्चों को रोजा फर्ज होता है। इस गर्मी में रोजा रखने वालों में मासूम बच्चों से लेकर 92 वर्ष तक के बुजूर्ग भी शामिल हैं। बच्चों में रोजा रखने की चाह इतनी ज्यादा रहती है कि परिजन के इनकार करने पर भी वह रोजा रखते हैं। इसी तरह बुजूर्ग भी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर खुदा की इबादत में रोजा नहीं छोड़ते।
जमीअत उलेमा ए हिंद शहर सदर मुफ्ती अ. हमीद सा. ने बताया इस्लाम के मुताबिक रोजा 10 वर्ष के बाद फर्ज होता है, लेकिन बड़ो को देख बच्चे भी रोजा रखने की जिद करते हैं।  6-7 साल तक के बच्चे भी आसानी से रख लेते हैं। शहर के मुगलपुरा स्थित मिर्जाआबिद बेग की 8 साल की बेटी लबिजा मिर्जा ने पहला रोजा रखा। शाम को परिजनों के साथ इफ्तार किया। लबिजा ने बताया कि रोजा रखने से उसे बहुत खुशी हुई है। वहीं मुगलपुरा की फातिमा बी 92 वर्ष के पड़ाव पर आने के बाद भी खुदा की इबादत भरे जोश की साथ करती हैं।
 फातिमा बी ने बताया कि वह सालों से रमजान के पूरे रोजे रखती आ रही है, अब तबीयत खराब रहती है फिर भी रोजे नहीं छोड़ती। रोजे रखने के साथ ही पांचों वक्त की नमाज भी अदा करती हैं। इधर सुनेरा के 8 वर्षीय शेख सऊद और तसमिया ने 21 वें रोजे को पहला रोजा रख दिनभर अल्लाह की इबादत की। शाम को मगरिब की अजान होते ही रोजदारों के साथ बच्चों ने रोजा खोला और दुआएं की।
जकात व फितरो का चलता है दौर
पाक माह रमजान में जकात व फितरा देते हैं। जकात व फितरा गरीब, मजबूर, यतीम व बेवाओं को दिया जाता हैं, जो पूरे रमजान माह चलता हैं। इस माह में मोमिन अफ्तार के वक्त बनने वाले विशेष पकवान, कपड़े, पैसे देकर अपना हक अदा करते हैं। वहीं रमजान माह के आखिर में ईद-उल-फीतर पर बड़े जोश के साथ फितरा देते हैं।
मछलियां करती हैं रोजेदारों के लिए दुआ
मुफ्ती अ. हमीद सा.ने बताया कि रोजा रखने वाले को अल्लाह सब्र देता है। हदीस में बताया गया है कि रोजदारों के लिए समुद्र की मछलियां, चरिंदे-परिंदे, सेवानाद, नफातात सुबह पौ फटने से लेकर अफ्तार के वक्त तक दुआएं करते हैं। हदीस में यह भी बताया गया है कि इस माह में तीन इंसानों की दुआएं कभी खाली नहीं जाती। जिसमें अफ्तार के वक्त रोजेदार, दूसरा शख्स अदिल बादशाह (इंसाफ करने वाला) और तीसरा शख्स मजलूम हैं।

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