शुद्ध पानी के प्रति लोगों में नहींं है जागरूकता, पांव पसार सकता है एईएस

Siddharthnagar, Uttar Pradesh, India
शुद्ध पानी के प्रति लोगों में नहींं है जागरूकता, पांव पसार सकता है एईएस

खराब है सरकारी हैण्डपम्प देशी नल का पानी पीने को मजबूर हैं लोग, तीन वर्ष पहले चिन्हित किए गए थे देशी नल, लगा था लाल निशान ...

सिद्धार्थनगर. बारिश शुरू होने के बाद पूरा जिला इंसेफेलाइटिस व एईएस को लेकर अलर्ट पर है। बीमारी से बचाव के लिए एक नहीं बल्कि तीन तीन महकमों को लगाया गया है। जिससे कि इस बार बीमारी अपना पैर न पसार सके। बीमारी के प्रति मुख्यमंत्री की गम्भीरता को लेकर हर कोई गम्भीर है। लेकिन पानी के प्रति जागरूकता के अभाव में इंसेफेलाइटिस से भी खतरनाक माना जाने वाला एईएस जिले में पांच पसार सकता है। जिससे मासूमों की जान खतरे में होगी। 



स्वास्थ्य विभाग द्वारा बीमारी से बचाव व रोकथाम के लिए जिला मुख्यालय से लेकर ब्लॉक व उपकेन्द्र स्तर पर पूरी तैयारी का दावा किया जा रहा है। लेकिन पड़ताल पर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित पीएचसी, सीएचसी पर डॉक्टरों व अन्य कर्मचारियों की कमी के कारण लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल पा रहीं हैं। इंसेफेलाइटिस को लेकर सूबे की सरकार के मुखिया की गम्भीरता को देख जिस प्रकार से विभागीय लोग अलर्ट है उसे लेकर अन्य विभागों के जिम्मेदारों में भी खौफ है। 



लेकिन पीने के पानी का इंतजाम करने वालों में कोई खौफ नहीं दिख रहा है। डीएम के तमाम निर्देश के बाद भी अभी तक खराब हैण्डपम्प ठीक नहीं हो सकें हैं। जिलाधिकारी स्वयं बीमारी से बचाव के लिए किए गए उपायों की प्रत्येक सप्ताह समीक्षा कर रहे हैं। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को स्वास्थ्य उपकेन्द्र वार नोडल बनाया गया है। जिससे कि सभी गांव के लोगों को बीमारी के प्रति आगाह किया जा सके। 



जिला अस्पताल में अब तक आए पांच मरीज

जिले में जनवरी माह से अब तक इंसेफेलाइटिस के लक्षण वाले पांच मरीजों को इलाज के लिए जिला अस्पताल में बने आईसीयू में भर्ती कराया गया था जिसमें से दो को मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था जबकि दो ठीक होने के बाद घर भेज दिया गया। एक मरीज बिना बताए ही जिला अस्पताल में इलाज के दौरान चला गया। अभी तक जिला अस्पताल में इस बीमारी से पीड़ित किसी भी मासूम की मौत नहीं हुई है। जबकि बीते वर्ष दो मेडिकल कॉलेज में एक दर्जन से अधिक मासूमों की मौत हुई थी। आईसीयू व एसएनसीयू प्रभारी डॉ.संजय चौधरी ने बताया कि अभी तक जांच के दौरान किसी भी बच्चे के इंसेफेलाइटिस से पीड़ित होने की पुष्टि नहीं हुई है। जबकि भर्ती होने वाले सभी पांच के खून की जांच कराई थी। 

पीएचसी, सीएचसी पर बना ईटीसी

इंसेफेलाइटिस की रोकथाम के लिए जिले के सभी प्राथमिक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर ईटीसी (इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेन्ट सेन्टर) बनाया जा रहा है। जहां पर इंसेफेलाइटिस से पीड़ितों के लिए दो बेड आरक्षित करने के साथ ही पर्याप्त मात्रा में दवाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित की गई है। ईटीसी के लिए डॉक्टरों की ड्यूटी भी लगाई गई। जिसकी मानीटरिंग मण्डल स्तर के अधिकारियों द्वारा प्रत्येक सप्ताह की जा रही है। प्रत्येक सप्ताह ईटीसी की रिपोर्टिँंग भी की जा रही है। अभी तक सीएचसी, पीचसी स्तर पर किसी के भी इंसेफेलाइटिस से पीड़ित होने की पुष्टि नही हुई है। 

उपकेन्द्र स्तर पर हो रही बुखार पीड़ितों की ट्रैकिंग

गांवों में लम्बे समय से बुखार से पीड़ित रहने वालों के भी ट्रैकिंग स्वास्थ्य विभाग द्वारा की जा रही है। उपकेन्द्र स्तर पर तैनात एएनएम द्वारा वीएचएनडी सत्रों के दौरान गांवों का भ्रमण कर बुखार से पीड़ित बच्चों को चिन्हित किया जा रहा है। लम्बे समय से बुखार से पीड़ित बच्चों को पीएचसी, सीएचसी स्तर पर रेफर करने का निर्देश दिया गया है। जिससे कि उनकी बेहतर जांच कर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा सकें। लम्बे समय से बुखार से पीड़ित बच्चों को ईटीसी में भर्ती कर उनका इलाज किया जाएगा। जिससे कि उन्हें बीमारी के प्रकोप में आने से बचाया जा सके। 

रोस्टर से गांवों में हो रही सफाई

जिलाधिकारी के निर्देश पर इंसेफेलाइटिस प्रभावित गांवों में रोस्टर के आधार पर सफाई की जा रही है। इसके लिए ग्राम पंचायत विभाग के साथ ही विकास विभाग व स्वास्थ्य के भी जिम्मेदारों को लगाया गया है। रोस्टर के आधार पर ग्राम पंचायत द्वारा गांवों में सफाई के साथ ही दवाओं का छिड़काव कराया जा रहा है। जिससे कि बीमारी के वाहकों को रोका जा सके। इतना ही नहीं जिलाधिकारी द्वारा सफाई व दवा के छिड़काव कार्य का दूसरे विभागों से सत्यापन भी कराया जा रहा है। अभी तक सफाई व दवाओ का छिड़काव नहीं कराने वाले चार प्रभारी चिकित्साधिकारियों व ग्राम पंचायत अधिकारियों को डीएम स्तर से नोटिस भी जारी की जा चुकी है। 

सुदूर क्षेत्रों में लगाया जा रहा कैम्प

जिले के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के अन्तर्गत आने वाले सुदूर क्षेत्र के गांवों के लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए डॉक्टरों की टीम द्वारा सुदूर क्षेत्रों में कैम्प लगाया जा रहा है। शासन के निर्देश पर प्रत्येक सप्ताह कैम्प का आयोजन कर लोगों के स्वास्थ्य की जांच कर उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के साथ ही स्वास्थ्य की बेहतरी का टिप्स दिया जा रहा है। जिससे कि लोगो को बीमारियों से बचाया जा सके। साथ ही जागरूकता के माध्यम बीमारी के रोकथाम का उपाय किया जा रहा है। 

जमीनी हकीकत

बन्द रहते है पीएचसी, सीएचसी के ईटीसी

जिले के ज्यादातर सीएचसी, पीएचसी पर स्थापित ईटीसी केन्द्रों पर ताला लटकता रहता है। इसके पीछे प्रभारी चिकित्साधिकारियों का तर्क होता है कि जब मरीज आते है तो उन्हें ईटीसी में भर्ती किया जाता है। अभी तक किसी भी सीएचसी, पीएचसी पर इंसेफेलाइटिस से पीड़ित होने वाले मरीज को भर्ती नहीं किया गया है। जिससे अभी तक ईटीसी से एक भी मरीज को ठीक नहीं हो सकें हंै। 

पानी को लेकर लोगों में नहीं है जागरूकता

मौजूदा समय में इंसेफेलाइटिस से भी खतरनाक बीमारी बना एईएस जो कि शुद्ध पानी के अभाव में फैलता है को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी उनकी सेहत पर भारी पड़ सकती है। पानी को लेकर लोगों में जागरूकता की कमीं के कारण इस बीमारी के पैर फैलाने का खतरा बना हुआ है। जल निगम व ग्राम पंचायतें भी ग्रामीणों को पीने के लिए शुद्ध पानी मुहैया कराने के इंतजाम को लेकर गम्भीर नहीं है। जिसका परिणाम यह है कि लोग आज भी देशी हैण्डपम्प का पानी पीेने व खाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही हैण्डपम्प के बगल में ही जमा पानी से भी बीमारी का खतरा है। इसके बाद भी जिम्मेदार गम्भीर नहीं है। लोगों के देशी नल का पानी पीने के लिए इस्तेमाल करने से जिले में एईएस का खतरा है। 

तीन वर्ष पहले देश नलों पर लगा था लाल निशाल

तीन वर्ष पहले पंचायती राज विभाग द्वारा एईएस से बचाव के लिए व देशी नलों के पानी लोग न पीएं इसके लिए लोगों को जानकारी देते हुए सभी गांवों के देशी नलों पर सर्वेक्षण कर उनकी गहराई आदि का पता कर देशी नलों पर लाल निशान लगाकर लोगों को इसका पानी पीने से मना किया गया था। लेकिन बरसात का दिन खत्म होने के साथ ही लोगों की जागरूकता भी चली गई। जिससे यह व्यवस्था ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई। 

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