10 रातों के इंतज़ार के बाद हुई थी सर्जिकल स्ट्राइक, रिपोर्ट में खुलासा 

Anuj Shukla

Publish: Feb, 09 2017 08:00:00 (IST)

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10 रातों के इंतज़ार के बाद हुई थी सर्जिकल स्ट्राइक, रिपोर्ट में खुलासा 

यह खुलासा सर्जिकल स्ट्राइक करने वाले जवानों को मिले प्रशस्ति से हुआ है। स्ट्राइक करने वाले 19 जवानों को 26 जनवरी के दिन भारत सरकार ने वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया था। 

नई दिल्ली. भारतीय सेना द्वारा लाइन ऑफ कंट्रोल के बाहर की गई सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर नया खुलासा हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सर्जिकल स्ट्राइक करने वाली बटालियन को इसके लिए 10 दिन तक अमावस्या की रात का इंतज़ार करना पड़ा। यह खुलासा सर्जिकल स्ट्राइक करने वाले जवानों को मिले प्रशस्ति से हुआ है। स्ट्राइक करने वाले 19 जवानों को 26 जनवरी के दिन भारत सरकार ने वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया था। हालांकि उनकी डिटेल जारी नहीं की गई थी। 

रिपोर्ट के मुताबिक लाइन ऑफ कंट्रोल को पार कर कार्रवाई करने वालों में एक कर्नल, पांच मेजर, दो कप्तान, एक सूबेदार, दो नायब सूबेदार, तीन हवलदार, एक लांस नाइक और चार पैराट्रूपर शामिल थे। ये जवान पैरा रेजिमेंट की 4 और 9वीं बटालियन के थे। इसमें शामिल मेजर रोहित सूरी को कीर्ति चक्र जबकि कर्नल हरप्रीत संधू को युद्ध सेवा मेडल और उनकी टीम को चार शौर्य चक्र और 13 सेवा मेडल मिले। 

स्ट्राइक से पहले की गई थी रेकी 

रिपोर्ट के मुताबिक़ उरी में आर्मी बेस कैम्प पर आतंकी हमले के बाद से ही पाकिस्तान को जवाब देने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक की तैयारी हो रही थी। हालांकि स्ट्राइक से पहले रेकी कर वहां के हालात का जायजा लिया गया था। स्ट्राइक के लिए बटालियन को अमावस्या के रात का इंतजार था। दरअसल, अमावस्या की रात को अंधेरा काफी गहरा होता है। यह सर्जिकल स्ट्राइक के लिए बटालियन के लिए अनुकूल था। 28-29 की अमावस्या की रात को बटालियन ने पार जाकर स्ट्राइक की।

हर टीम को सौंपा गया था काम 

सबकुछ पहले से ही तयशुदा था। प्रशस्तिपत्र के मुताबिक़ इसके लिए बटालियन में अलग-अलग टीमें बनाकर सबकों अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक़ मेजर सूरी की टीम के ऊपर लॉन्च पैड के पास आतंकियों को मारने का काम था। दूसरे मेजर की टीम टारगेट के साथ-साथ उन सब जगहों पर नजर बनाए हुई थी जहां से मुश्किल हालात में भारतीय सेना की टीम भी हमला कर सकती थी। तीसरे मेजर की टीम पर आतंकियों के उन ठिकानों को तबाह करने के जिम्मेदारी थी जिसमें वे छिपते थे। 

चौथे मेजर के जिम्मे था हथियारों को ख़त्म करना 

चौथे मेजर के जिम्मे ग्रेनेड के जरिए आतंकियों के हथियारों के जखीरे को खत्म करना था। पांचवे मेजर के ऊपर सभी टीमों की सुरक्षा पर नजर रखना था। पूरा ऑपरेशन इतना नियोजित था कि भारत का कोई जवान शहीद नहीं हुआ। एक पैराट्रूपर को चोट आई थी।

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