लूट से बचाने को बनाया फीस कानून: राज्य सरकार

Mukesh Sharma

Publish: Jun, 20 2017 04:43:00 (IST)

Surat, Gujarat, India
लूट से बचाने को बनाया फीस कानून: राज्य सरकार

राज्य सरकार ने कहा कि कानून का उद्देश्य पूरा करने के लिए निजी स्कूलों की फीस को निर्धरित किया गया

अहमदाबाद।राज्य सरकार ने कहा कि कानून का उद्देश्य पूरा करने के लिए निजी स्कूलों की फीस को निर्धरित किया गया है। निजी स्कूल चेरिटेबल ट्रस्ट व नॉन शेयरिंग कंपनी के तहत स्थापित की गई हैं। ऐसे स्कूल नफा नहीं कर सकते। स्कूल एक ट्रस्ट है कोई व्यक्ति नहीं। स्कूल आर्थिक रूप से विद्यार्थियों को नहीं लूटे, इसके लिए यह कानून बनाया गया है।
मुख्य न्यायाधीश आर सुभाष रेड्डी व न्यायाधीश वी एम पंचोली की खंडपीठ के समक्ष पेश किए जवाब में यह कहा गया कि स्कूल फीस व अन्य फीस निर्धारित करने के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार फीस निर्धारण समिति को दी गई है।

इसलिए उचित न्याय किया जाएगा। स्कूलों के शिक्षकों के वेतन की समीक्षा का अधिकार भी इसी समिति को दिया गया है।
राज्य सरकार ने कहा कि यह कानून स्कूलों की फीस तय करने की स्वतंत्रता पर कुठाराघात बताए जाने की दलील पूरी तरह गलत है। इस कानून के तहत स्कूलों को फीस खुद ही तय करने का अधिकार है और इस संबंध में प्रस्ताव फीस समिति के समक्ष पेश करना है। इसमें विभिन्न मुद्दों को ध्यान में रखकर यह तय किया जाएगा कि फीस वाजिब है या नहीं। ऐसी परिस्थिति में इस कानून को असंवैधानिक करार नहीं दिया जा सकता। इसलिए अधिनियम के खिलाफ दायर याचिकाएं खारिज करनी चाहिए।

अमलीकरण स्थगित रखने की गुहार

उधर स्कूलों की ओर से पेश किए गए जवाब में कहा गया कि फीस निर्धारण अधिनियम के तहत नियमों के अमलीकरण को फिलहाल स्थगित रखना चाहिए। फीस निर्धारण समिति व समीक्षा समिति को भी गैरकानूनी माना जाए।  उच्च न्यायालय नियम बनाने के लिए समिति बनाए। इस समिति में बार काउंसिल ऑफ गुजरात के एक प्रतिनिधि को शामिल किया जाना चाहिए। फीस निर्धारण के लिए नए नियम तीन महीने में बनाए जाने चाहिए। निजी स्कूलों की ओर से यह भी कहा गया कि स्कूल का संचालन ट्रस्ट की ओर से किया जा रहा है। स्कूल जो फीस लेती है वह ट्रस्ट में जमा होता है।

यदि ज्यादा फीस जमा होती है तो ज्यादा रकम को अन्य स्कूल में ट्रांसफर करने की मंजूरी मिलनी चाहिए। प्रत्येक स्कूलों में विद्यार्थियों को अलग-अलग गतिविधियों में रूचि होती है। नाटक, नृत्य, खेल-कूद, पेंटिंग जैसी अलग-अलग गतिविधियों के लिए एक समान फीस किस तरह से तय की जा सकती है। प्रत्येक स्कूल की सुविधा अलग-अलग होती है। मामले की सुनवाई मंगलवार को जारी रहेगी।

अब अभिभावक भी पहुंचे

इस मामले में अब अभिभावक भी उच्च न्यायालय में कूद पड़े हैं। ऑल इंडिया पैरेन्ट्स एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि फीस निर्धारण समिति में अभिभावकों को प्रतिनिधित्व दिए जाने की मांग की गई है। सरकार ने जो कानून बनाया है उसमें अभिभावकों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। इसमें यह भी कहा गया कि कई अभिभावक काफी ऊंचे घराने से हैं। ये अभिभावक अपने बच्चों के लिए लाख रुपए की फीस भरकर ज्यादा सुविधा वाली स्कूलों में नामांकन दिलाना चाहते हैं, ऐसे में राज्य सरकार उनके इस निर्णय को नहीं अटका सकती। यह उनके मूलभूत अधिकारों पर तुषारापात के समान है।

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