उल्लास और आनंद के समागम के साथ जीवन में रंग भरती होली

Sunil Sharma

Publish: Mar, 13 2017 09:43:00 (IST)

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उल्लास और आनंद के समागम के साथ जीवन में रंग भरती होली

रंग से जो परे है, वह रंगहीन नहीं, वह पारदर्शी है। वैराग्य यानी आप न तो कुछ रखते हैं और न ही कुछ परावर्तित करते हैं

रंग से जो परे है, वह रंगहीन नहीं, वह पारदर्शी है। वैराग्य यानी आप न तो कुछ रखते हैं और न ही कुछ परावर्तित करते हैं। अगर आप पारदर्शी हो गए हैं तो आपके पीछे की कोई चीज लाल है, तो आप भी लाल हो जाते हैं। अगर नीली है, तो आप भी नीले हो जाते हैं। आपके भीतर कोई पूर्वाग्रह होता ही नहीं। आप जहां भी होते हैं, उसी का हिस्सा हो जाते हैं। वह रंग एक पल के लिए भी आपसे चिपकता नहीं। आप केवल उसके ही नहीं होते हैं। आप सबके होते हैं। इसीलिए अध्यात्म में वैराग्य पर ज्यादा जोर दिया जाता है।

हर रंग कुछ कहता है
रंगों से हमारे शरीर, मन, आवेग आदि का बहुत गहरा संबंध है। शारीरिक स्वास्थ्य और बीमारी, मन का संतुलन और असंतुलन, आवेगों में कमी और वृद्धि ये सब इन प्रयत्नों पर निर्भर है कि हम किस प्रकार के रंगों का समायोजन करते हैं और किस प्रकार हम रंगों से अलगाव या जुड़ाव करते हैं। जैसे नीला रंग शरीर में कम होता है, तो क्रोध अधिक आता है। नीले रंग के ध्यान से इसकी पूर्ति हो जाने पर गुस्सा कम हो जाता है। सफेद रंग की कमी होती है, तो अशांति बढ़ती है, लाल रंग की कमी होने पर आलस्य और जड़ता पनपती है। पीले रंग की कमी होने पर ज्ञानतंतु निष्क्रिय हो जाते हैं।

बुराइयों के खिलाफ प्रयास
होली पर रंगों की गहन साधना हमारी संवदेनाओं को भी उजला करती है क्योंकि होली बुराइयों के विरुद्ध उठा एक प्रयास है। इसी से जिंदगी जीने का नया अंदाज मिलता है और दूसरों का दु:ख-दर्द बांटा जाता है। बिखरती मानवीय संवेदनाओं को जोड़ा जाता है। होली को आध्यात्मिक रंगों से खेलने की एक पूरी प्रक्रिया आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा प्रणित प्रेक्षाध्यान पद्धति में उपलब्ध है। होली पर प्रेक्षाध्यान के ऐसे विशेष ध्यान आयोजित होते हैं, जिनके जरिए विभिन्न रंगों की होली खेली जा सकती है।

संतोष में है रंगों का महत्व
रंगों का महत्त्व इस मामले में भी है कि जिस रंग को आप परावर्तित करते हैं, वह अपने आप ही आपके आभामंडल से जुड़ जाता है। जो लोग आत्म-संयम या साधना के पथ पर हैं, वे खुद से किसी भी नई चीज को नहीं जोडऩा चाहते। उनके पास जो है, वह उसके साथ ही काम करना चाहते हैं। यानी आप अभी जो हैं, उस पर ही काम करना बहुत महत्त्वपूर्ण है। एक-एक करके चीजों को जोडऩे से जटिलता पैदा होती है। इसलिए उन्हें कुछ नहीं चाहिए। विचार यह है कि वे जो भी हैं, उससे ज्यादा वे कुछ भी नहीं लेना चाहते।  

जैसा आप बिखेरते हैं जीवन में वैसा ही रंग बिखरने लगता है
हर इंसान किसी न किसी रंग में रंगा और अपने राग में मस्त है। दुनिया के रंगमंच पर विभिन्न भूमिकाएं अदा कर रहे इंसान अलग-अलग रंगों की शरण लेते हैं। साधु-संन्यासी गेरुआ पहनते, तो समाज सेवी सफेद, वहीं सिनेमा के पर्दों पर अभिनय करने वाले कलाकार दर्शकों का दिल बहलाने के लिए रंग-बिरंगे वस्त्र पहनते हैं। असल में ब्रह्मांड के किसी भी चीज में रंग नहीं है। पानी, हवा, अंतरिक्ष और पूरा जगत ही रंगहीन है। यहां तक कि जिन चीजों को आप देखते हैं, वे भी रंगहीन हैं। रंग केवल प्रकाश में होता है। रंग वह नहीं है, जो दिखता है, बल्कि वह है जो त्यागता है। आप जो रंग बिखेरते हैं, वही आपका रंग हो जाएगा। जो अपने पास रख लेंगे, वह आपका रंग नहीं होगा। ठीक इसी तरह से जीवन में जो कुछ भी आप देते हैं, वही आपका गुण हो जाता है। अगर आनंद देंगे तो लोग कहेंगे कि आप एक आनंदित इंसान हैं। आपके व्यवहार और आचरण ही बताएगा कि आप पर किस रंग की छाप है।

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