जगत में विख्यात है मां विंध्यवासिनी मंदिर, भक्तों के याद करते ही होते हैं सारे काम

Sunil Sharma

Publish: Feb, 23 2017 01:10:00 (IST)

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जगत में विख्यात है मां विंध्यवासिनी मंदिर, भक्तों के याद करते ही होते हैं सारे काम

मांगे मुराद पूरी करने वाली मां विंध्यवासिनी देवी को छत्तीसगढ़ में बिलाई दाई भी कहा जाता है, जिनकी लीला अपरंपार है

देवी मां विंध्यवासिनी की ख्याति प्रदेश और देशभर में नहीं, अपितु विदेशों में भी है। मांगे मुराद पूरी करने वाली मां विंध्यवासिनी देवी को छत्तीसगढ़ में बिलाई दाई भी कहा जाता है, जिनकी लीला अपरंपार है। स्वयं-भू नगर आराध्य माता विंध्यवासिनी देवी मां बिलाई माता के इतिहास गाथा की जितना बखान किया जाए, उतना कम है।

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देवी-देवताओं का गढ़ छत्तीसगढ़ श्रद्धा भक्ति और विश्वास का केंद्र है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में नया बस स्टैंड से 2 किमी की दूरी में माता विंध्यवासिनी देवी का मंदिर है। माता धरती फोड़कर प्रकट हुई है, इस कारण इसे स्वयं-भू विंध्यवासिनी माता कहते हैं। अंचल में बिलाई माता के नाम से यह प्रसिद्ध है।

शास्त्र वेद भागवत पुराण के मुताबिक विंध्यवासिनी माता श्रीकृष्ण की बहन है। योग माया कृष्ण बहन नंदजा यशोदा पुत्री विंध्यवासिनी मां शिवमहापुरायण में नंद गोप गृहे माता यशोदा गर्भ संभव तत्सवै नास्यामि विंध्याचल वासिनी मूर्ति का पाषण श्याम रंग का है। अंबे मैय्या गौरी माता विंध्यवासिनी देवी मां के 108 नाम है।

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धार्मिक इतिहास में मान्यता

धार्मिक इतिहास और राजलेखानुसार यह क्षेत्र पहले घनघोर बनबिवान जंगल था। एक समय राजा नरहर देव अपनी राजधानी कांकेर से सैनिकों के साथ इस स्थान में शिकार खेलने आए। राजा के सैनिक आगे की ओर बढ़ रहे थे, एकाएक अचानक उनका दल-बल सैनिक हाथी-घोड़े रूक गए। काफी प्रयास के बाद भी आगे बढऩे में विफल रहे। राजा-सैनिक वापस चले गए। दूसरे दिन भी यह घटना हुई। राजा ने सेनापति को आदेश दिया कि इस स्थान पर ऐसा क्या है, पता करें। सैनिकों ने आदेश का पालन किया।

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खोजबीन जांच में उन्होंने देखा, पाया कि एक असाधारण पत्थर तेजमयी आकर्षक, मनमोहन, मंत्रमुग्ध है। उसके आसपास जंगली बिल्लियां बैठी थी। राजा को सूचना दी गई, राजा खुद आए। वे इस असाधारण पत्थर को देखकर मंत्रमुग्ध आकर्षित हो गए। वे अपने सेनापति को आदेश दिया कि शीघ्र ही इसे यहां से हटाकर राजधानी में स्थापित करें। सैनिक राजा का आदेश पाकर खुदाई कार्य में जुट गए। अचानक वहां से जल की अविरल जलधारा निकलना आरंभ हो गया तो खुदाई कार्य रोक दिया गया।

रात्रि में राजा नरहर देव को देवी मां ने स्वप्न दिया कि राजन मुझे यहां से न ले जाए, मैं नहीं जाउंगी, तुम्हारे सारे प्रयास विफल होंगे। मेरी पूजा अर्चना आराधना इसी स्थान पर करें। यह जगत के लिए मंगलमय कल्याणकारी सुखमय, शांति और मनोकामना पूर्ण रहेगी। मेरा आशीर्वाद सभी को मिलेगा। बाबा भोलेनाथ, हनुमान जी का आशीर्वाद भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। यहां सर्वप्रथम गोंड़ राजा के शासनकाल में मंदिर का निर्माण किया गया।

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