47 साल से भक्ति संगीत के मंचों की शान है यह जोड़ी

Ujjain, Madhya Pradesh, India
47 साल से भक्ति संगीत के मंचों की शान है यह जोड़ी

उज्जैन के नाम एक और विश्व कीर्तिमान, पं. गोपाल, शुकदेव, कौशलेंद्र और राघवेंद्र शर्मा बंधु की जोड़ी 1970 से अब तक एक साथ, सम्मानित 

प्रशांत शर्मा/उज्जैन. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, जतिन-ललित, नदीम-श्रवण और भी एेसे कई नाम हैं, जिन्होंने एक साथ मिलकर न सिर्फ नाम कमाया बल्कि एक पहचान भी बनाई। किसी अनहोनी या किसी अन्य कारण ये जोडि़यां टूट गई, लेकिन एक जोड़ी ऐसी है जिसमें दो नहीं बल्कि चार नाम शामिल हैं। यह जोड़ी है शर्मा बंधु की, जो 47 वर्षों से लगातार एक साथ भक्ति संगीत में अपनी एक विशेष पहचान बनाए हुए हैं। पं. गोपाल, शुकदेव, कौशलेंद्र और राघवेंद्र शर्मा बंधु की ये जोड़ी वर्ष 1970 से लेकर अब तक लगातार बनी हुई है। इतने लंबे समय तक इस जोड़ी के बने रहने पर वल्र्ड बुक रिकॉर्ड की सहयोगी संस्था एल्मा द्वारा इंदौर में 17 जून को एक विशेष कार्यक्रम के दौरान सम्मानित किया गया। इस दौरान शर्मा बंधुओं को प्रमाण पत्र और एक स्मृति चिन्ह भी भेंट किया गया।

यह रहें कार्यक्रम
कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र, प्रेमचंद्र पांडे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के डॉ. के सुब्बाराव, अनूप जलोटा, मलखान सिंह, केडिया ग्रुप की चेयरमैन रितु केडिया सहित कई गणमान्य हस्तियां उपस्थित थीं। कार्यक्रम में अपने क्षेत्र में विशिष्ठ उपलब्धि हासिल करने पर शर्मा बंधुओं को सम्मानित किया गया।

1923 से शुरू हुआ सफर
सम्मान के बाद पत्रिका से विशेष बातचीत में पं. शुकदेव शर्मा ने बताया कि भक्ति संगीत का यह सफर उनके पिता पं. रामानंद शर्मा ने 1923 में शुरू किया था। शुरुआती दिनों में उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीत दिया और अभिनय भी किया था। इसके बाद वे फिल्मी दुनिया से दूर होकर भक्ति संगीत से जुड़ गए। इसके बाद वे लगातार भक्ति संगीत के लिए कार्य करते रहे। 1970 में जब चारों भाई पं. गोपाल शर्मा, पं. शुकदेव शर्मा, पं. कौशलेंद्र शर्मा व पं. राघवेंद्र शर्मा ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे चारों एक साथ जुड़ गए।

1972 में पहली कंपोजिंग
उन्होंने बताया कि भक्ति संगीत के लिए पिता से दीक्षा लेने के साथ चारों भाई अपने कार्य को आगे बढ़ा रहे थे। वर्ष 1972 में फिल्म परिणय के लिए सूरज की गर्मी से... गीत की कंपोजिंग की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। चारों भाई रामचरित मानस की चौपाई और भजनों को गाकर घर-घर में पहचान बना गए। हालांकि फिल्मों में उनका सफर जारी रहा। 1971 में वीणा पत्रिका के लिए एक तैयार किए गए भजन तेरा-मेरा, मेरा तेरा सब प्रभु की माया... भजन की धुन को 1976 में आई फिल्म नागिन में एक गीत में प्रयोग किया।

यह भी पढ़े...                                                                         उज्जैन की अभिवृद्धि राष्ट्रीय गोपीकृष्ण अवार्ड के लिए नॉमिनेट


भक्ति संगीत में नहीं हो रहा नया
बातचीत के दौरान उन्होंने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि संगीत की हर विधा आगे बढ़ गई है, परंतु भक्ति संगीत के क्षेत्र में कुछ नया नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा फिल्मों में भक्ति संगीत की कमी के बारे में कहा कि एक दौर था, जब फिल्मों में भजन रखे जाते थे, वह दौर समाप्त हो गया है। गजल व कव्वाली का भी दौर था। यह सब श्रोताओं पर निर्भर है कि वे क्या चाहते हैं। उन्होंने कहा कि आज भक्ति संगीत के क्षेत्र में नई प्रतिभा सामने नहीं आ रही है, इस कारण भक्ति संगीत के क्षेत्र में कुछ नया देखने को नहीं मिल रहा है।

तनाव को दूर करें संगीत
उन्होंने कहा कि संगीत कोई भी हो वह एेसा होना चाहिए कि इस भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान के तनाव को दूर करें। भक्ति संगीत के बारे में शुकदेव शर्मा का कहना था कि भक्ति संगीत का मुख्य उद्देश्य इंसान को भगवान के समीप ले जाना है। हालांकि यह बहुत अधिक संभव नहीं है, परंतु फिर भी भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ देर भगवान के समीप रहने का माध्यम है। नए कलाकारों के बारे में उन्होंने कहा कि जो संगीत के लिए कुछ नया कर रहे हैं वे उन्हें साधुवाद देते हैं।

देश ही नहीं विदेशों में भी प्रस्तुति
रामचरित मानस की चौपाइयों को गाकर हर घर में पहचान बनाने के साथ ही शर्मा बंधुओं ने देश के विभिन्न शहरों के साथ विदेशों में भी प्रस्तुति दी है। 47 वर्षों के दौरान सभी भाई कई विशिष्ट सम्मान और पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। विदेशों में भी कई बड़ी हस्तियों के सामने वे अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। इसके साथ ही कई भक्ति संगीत और आरती के एलबम तैयार कर चुके हैं। भक्ति संगीत के लिए हमेशा कुछ नया करने के लिए वे आज भी कई स्थानों पर प्रस्तुति दे रहे हैं। 

Rajasthan Patrika Live TV

1
Ad Block is Banned