खुद हकीकत बनते गए मेरे सपने, हौसला देखकर

Ujjain, Madhya Pradesh, India
खुद हकीकत बनते गए मेरे सपने, हौसला देखकर

कालिदास संकुल में नि:शक्त बच्चों की रंगोली, चित्रकला, गायन व नृत्य स्पर्धा आयोजित की गई। विभिन्न स्पर्धाओं में 300 से अधिक बच्चों ने भाग लेकर हौसलों से कमाई अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। 

उज्जैन. कालिदास संकुल का हॉल... राजस्थानी गीत-संगीत बज रहा है, पारंपरिक वेशभूषा में पांच लड़कियां संगीत पर ताल मिलाकर नृत्य कर रही हैं, दर्शक ताली बजा रहे... सबकुछ किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसा है, लेकिन फिर भी कुछ अलग है, एक बड़ा अंतर है। वह यह कि उक्त कलाकार जिस धुन पर नाच रहे हैं, वह उन्हें सुनाई ही नहीं दे रहा। बस एक रिद्म है, और कुछ साथ है तो वह है इनका हौसला, इरादों की सशक्तता, जो शरीर से नि:शक्त होने के बाद भी इन्हें आपके-हमारे बराबर या इससे भी ऊपर ला खड़ा कर देती है, क्योंकि शारीरिक कमी के बावजूद इनके चेहरे पर मायूसी नहीं, जिंदगी से जितना मिला उसकी खुशी थी।

" डर मुझे भी लगा फासला देखकर, पर मैं बढ़ता गया रास्ता देखकर
खुद ब खुद हकीकत बनते गए मेरे सपने, मेरा हौसला देखकर।"

नि:शक्त बच्चों की रंगोली, चित्रकला, गायन व नृत्य स्पर्धा
प्रशासन की ओर से गुरुवार को कालिदास संकुल में नि:शक्त बच्चों की रंगोली, चित्रकला, गायन व नृत्य स्पर्धा आयोजित की गई। विभिन्न स्पर्धाओं में 300 से अधिक बच्चों ने भाग लेकर हौसलों से कमाई अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। प्रतिभागियों की कला और कमियों को हराकर जिंदगी को जीने के जोश ने देखने वालों को हतप्रभ कर दिया। इनकी कला किसी मायने में आम कलाकार से कमतर नहीं थी। किसी ने ड्राइंग शीट पर पैरों से उगता सूरज बनाकर इच्छाशक्ति की चमक साबित की तो किसी मूक-बधिर ने अपने मन की खूबसूरती को सीनरी के रूप में खूबसूरत चेहरा दिया। पैरों से चलने को मोहताज दीपक ने रंगोली में जिंदगी के रंग दर्शाए तो सनी ने भोले मेरे यार से मिला दे गीत गाकर मानो उम्मीद की ताकत दिखाई। स्पर्धा आयोजित हुई थी, इसलिए प्रतिभा नंबर के पैमानों पर भले ही आंकी गई, लेकिन हकीकत में हर कोई विजेता था।




पैरों से बनाई सपनों की दुनिया
25 वर्ष की मैगी बजाज, उसके हाथ काम नहीं करते हैं, चलने और बोलने में भी परेशानी है, लेकिन उसके इरादे मजबूत हैं। हाथों ने साथ नहीं दिया तो उसने पैरों को ही हाथ बना लिए। मैगी पैरों से ही चित्रकारी कर लेती हैं। स्पर्धा में उसने अपने पैरों से सपनों की दुनिया ड्राइंग शीट पर उकेरी, जिसमें छोटा-सा घर, बाहर खड़ी स्वस्थ लड़की (शायद वह स्वयं), आगे पानी बहता हुआ, जिसमें बतख भी है। ड्राइंग पूरी होने के बाद मैगी ने पैरों से ही ड्राइंग शीट को उठाकर झटकारा और मैडम को दे दी। इसके बाद उसने एक-एक कलर पेंसिल को पैरों से उठाकर बड़े ही तरीके से बॉक्स में रखी और कवर लगाया। स्पर्धा पूरी होने के बाद उसने रंगोली प्रतियोगिता में बैठ दोस्त की मदद की और पैरों से रंग भरे।

कागज पर उतरी मन की खूबसूरती
कार्तिक चौक निवासी वीणा शर्मा के चेहरे पर अलग ही चमक थी। विशेष शिक्षक दीप्ति चौबे ने बताया, वीणा घर से कम ही निकलती हैं, इस प्रकार के कार्यक्रम में तो वह पहली बार आई हैं। वीणा सुन और बोल नहीं सकती है लेकिन उसकी चित्रकारी किसी प्रोफेशनल आर्टिस्ट से कम नहीं है। स्पर्धा में वीणा ने एक महिला का स्कैच बनाया था जो इतना खूबसूरत था जैसे वीणा की अपने मन की खूबसूरती का प्रतिबिम्ब बनाया हो। स्पर्धा के दौरान पूरे समय वीणा के चेहरे पर खुशी छाई रही।

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