अन्धविश्वास नहीं मानता दलित साहित्य: पूर्व राज्यपाल

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अन्धविश्वास नहीं मानता दलित साहित्य: पूर्व राज्यपाल

दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ शुभारंभ 

वाराणसी. यूपी के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद ने कहा कि हिन्दी के द्वार पर एक दूसरा साहित्य 'दलित साहित्य' दस्तक दे रहा है। दलित साहित्य की अवधारणा 'साहित्य समाज का दर्पण' से प्ररित है, जिसमें दलित समाज को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने कहा कि दलित साहित्य अन्ध विश्वास को नहीं मानता है और इस साहित्य को साहित्यकारों को अपना लेना चाहिए, नहीं तो वह अलग रास्ता अख्तियार कर लेगा। पूर्व राज्यपाल शुक्रवार को पं. विद्या निवास मिश्र की स्मृति में दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। 



साहित्य अकादमी नई दिल्ली, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा और विद्याश्री न्यास की ओर से दुर्गाकुण्ड स्थित श्रीधर्म संघ शिक्षा मंडल सभागार में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। अध्यक्षता करते हुए अमरकंटक विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश के कुलपति प्रो. टीवी कुट्टिमनी ने कहा कि पं. विद्या निवास मिश्र के साहित्य में गांव और देहात का विशुद्ध चित्रण मिलता है। पं. मिश्र ने उत्तर और दक्षिण को अपने निबन्धों के माध्यम से जोडऩे का प्रयास किया। 



विशिष्ट अतिथि जर्मनी तातियाना ने कहा कि इस देश में विद्या का बहुत बड़ा महत्व है। इस दौरान विद्वानों ने हिन्दी गद्य की आलोचना और उसके प्रयोजन के महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर आनन्द वर्धन, रामसुधार सिंह, डॉ. उदयन मिश्र, डॉ. ध्रुव नारायण पाण्डेय, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र, अरिवन्द कुमार, बलराज पाण्डेय आदि उपस्थित रहे। 

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