बहिन जी के गढ़ में दिखेगा बागियों का बल 

Awesh Tiwary

Publish: Feb, 16 2017 02:20:00 (IST)

Varanasi, Uttar Pradesh, India
 बहिन जी के गढ़ में दिखेगा बागियों का बल 

 बहिन जी के गढ़ में दिखेगा बागियों का बल 

आवेश तिवारी 
वाराणसी/ कौशाम्बी । उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद की सीमा से सटा प्राचीनकाल में वत्स देश की राजधानी हुआ करता था। |इलाहाबाद के दक्षिण-पश्चिम से 63 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कौशाम्बी को पहले कौशाम के नाम से जाना जाता था। यह बौद्ध व जैनों का पुराना केन्द्र है तीन  विधानसभा सीटों वाले कौशाम्बी जिले के परिणाम पिछले दो दशकों से बसपा के पक्ष में ज्यादा रहे हैं,लेकिन इस बार मुकाबला  पहले से थोडा अलग है।

यह बहिन जी का इलाका है 
  भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या के  गृह क्षेत्र कौशाम्बी  में प्रवेश करते ही लगता है क़ि हम देश की  किसी धार्मिक नगरी में आ गए हैं। पिछले एक दशक में शहर का मिजाज भी बदला है भीड़ भी बढ़ी है, जो चीज नहीं बदली है उनमे इस शहर की राजनीति भी है। बसपा के मजबूत गढ़ के रूप में मशहूर कौशाम्बी में चुनावी रंगत  चौक चौराहों पर लोगों की बातचीत में ही नजर आती है।  सिराथू विधानसभा में जब हम एक दूकान पर पान जमा रहे अखिलेश सिंह से पूछते हैं कि क्या परिणामों में कोई उलटफेर संभव है? तो वो कहते हैं आप इसे शुजाउद्दौला और  मेजर मुनरो के बीच की लड़ाई न समझे,लेकिन मुकाबला टक्कर का होगा यह तय है। फूल बेच रही राजवन्ती से तो साफ़ तौर पर कहती है "कोई राजा नहीं होने वाला , यह बहिन जी का इलाका है "।सपा, भाजपा ,बसपा  और अन्य दलों के दफ्तरों पर देर रात तक जमी भीड़ कौशाम्बी  के चुनावी दंगल  की गर्मी का मजमून दिखाती है,वहीँ उम्मीदवारों के चेहरे पर पड़ी शिकन से साफ़ अंदाजा हो जाता है इस बार मुकाबला बेहद तगड़ा होने जा रहा है।तीनो ही विधानसभा सीटों से बागी या तो चुनाव लड़ रहे हैं या नेपथ्य में अपना काम कर रहे हैं।  2012 के विधानसभा चुनाव में कौशाम्बी में दो विधानसभा सीटों पर बसपा का कब्ज़ा हुआ था वहीँ भाजपा के हिस्से में केवल एक सीट आई थी यह स्थिति तब थी जब पूरे प्रदेश में समाजवादी पार्टी की लहर चल रही थी,हांलाकि बाद में हुए उपचुनाव में सिराथू की सीट सपा के खाते में चली गई।

   केशव से नाराज सिराथू 
कौशाम्बी की सिराथू सीट राजनैतिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है। पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने राजनैतिक सफर की शुरुआत सिराथू-मंझनपुर विधानसभा सीट पर चुनाव जीत के किया था। आजाद भारत में प्रदेश के दूसरे विधानसभा चुनाव 1957 में हेमवती नंदन बहुगुणा ने सिराथू-मंझनपुर विस सीट से चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे थे। नए परिसीमन के बाद सिराथू व मंझनपुर अलग अलग विधानसभा बनी तो बहुगुणा ने सिराथू को अपनी कर्मभूमि चुना और दोबारा विधायक बने।2012 के विधानसभा चुनाव में यहाँ से भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या चुनाव विजयी हुए थे इसके पहले केशव प्रसाद मौर्या इलाहबाद से दो बार चुनाव हार चुके थे। इंटर कालेज के अध्यापक बी एन सिंह कहते हैं कि केशव ने जिस तरह से सिराथू की जनता को दगा दिया वो हम अभी तक नहीं भूले हैं। गौरतलब है कि विधायक बनने के दो वर्ष बाद ही केशव प्रसाद मौर्या फूलपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने चले गए ,नतीजा यह हुआ कि इस सीट पर उपचुनाव हुआ और नाराज जनता ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार वाचस्पति को विजयी बना दिया।सिराथू  विधानसभा में सबसे बड़ी समाया रोजगार और सड़कों की है।सिराथू विधान सभा में कभी देश भर में नाम कमाने वाला शमसाबाद का बर्तन उद्योग दम तोड़ रहा है नतीजा यह है कि यहाँ के कारीगर काम के आभाव मे दूसरे शहरों की ओर पलायन कर रहे है।  पूरे विधानसभा में सड़कों की हालत बेहद खराब है जबकि देशी विदेशी पर्यटकों की भारी तादात इन्ही सड़कों से आती जाती है,चूँकि सड़के खराब है इसलिए पर्यटन उद्योग भी पूरी तरह से चौपट हो रहा है। पिछले ७ सालों से सिराथू में रह रहे आलोक कहते हैं "जली की हालत कौशाम्बी में बेहद खराब है.ऐसा क्यूँ है समझ में नहीं आता है कई गाँव ऐसे जहाँ अभी तक बिजली नहीं पहुंची है बस खम्भे गाड़ दिए गए हैं ,सिराथू में भी लाइन कब आये जाए कोई नहीं जानता,वोल्टेज भी बेहद खराब है"।सिराथू की जनता की आम शिकायत है कि मौजूदा विधायक जी कभी दिखाई  नहीं देते ,विकास के नाम पर उन्होंने  केवल हैंडपंप ही लगवाए हैं।

 मंझनपुर में मजबूत सरोज 
कौशाम्बी की मंझनपुर विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के सबसे मजबूत गढ़ के रूप में जानी जाती है यहाँ पर पिछले बीस साल से मायावती के बेहद नजदीक माने जाने वाले इन्द्रजीत सरोज का कब्ज़ा है ,इस बार इन्द्रजीत सरोज से मुकाबले के लिए समाजवादी पार्टी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हेमंत चौधरी को अपना उम्मीदवार बनाया है ,तो भाजपा से लाल बहादुर मैदान में हैं विधानसभा के टेंवा गाँव के राजबिहारी कहते हैं "इन्द्रजीत सरोज को जाति बिरादरी की वजह से जीत नहीं मिलती ,उनके अपने काम की वजह से मिलती हैं उन्होंने क्षेत्र का बहुत विकास किया है", लेकिन राजबिहारी के उलट गाँव के ही अयोध्या प्रसाद कहते हैं सरोज जी ने केवल उदघाटन किया है जो भी काम उन्होंने शुरू कराया आधा अधुरा पड़ा हुआ है लेकिन मंझनपुर विधानसभा के लोगों की यह आम शिकायत है कि जब से प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तबसे इस क्षेत्र का विकास रुक गया जानबूझ कर इन्द्रजीत सरोज को पीछे धकेंलने की कोशिश की गई ,टेंवा की जनता की आम शिकायत है कि पिछले पांच साल से निरामानाधीन टेंवा ,पश्चिम शरीर सड़क मार्ग नहीं बन पाया जिससे हजारों लोगों की जिंदगी मुश्किल बनी हुई है,मंझनपुर में अच्छे विद्द्यालयों की कमी है सो छात्र छात्राओं को लम्बी दूरी तट करके सिराथू जाना पड़ता है ,बसपा कार्यकर्ता रामजी कहते हैं "सरोज जी चुनावी सभा में नौकरी दिलाने का वायदा किया हैं देखना होगा परिणाम आने के बाद वो क्या करेंगे"।

मुस्लिम उम्मीदवारों का चायल में दिखेगा दम
अल्पसंख्यक बहुल चायल विधानसभा सीट पर इस बार सपा कांग्रेस गठबंधन और बसपा दोनों ने ही मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं चायल विधानसभा से वर्तमान बसपा विधायक आसिफ जाफरी के विरुद्ध कांग्रेस-सपा ने अप्रत्याशित फैसला लेते हुये पूर्व मे घोषित उम्मीदवार राम यज्ञ द्विवेदी की जगह तलत अजीम को टिकट दे दिया गौरतलैब है कि चायल विधानसभा मे मुस्लिम वोटर हार जीत का रास्ता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं यहाँ से भाजपा ने संजय गुप्ता को टिकट दिया है ,सपा कांग्रेस में टिकट को लेकर यहाँ गहरा विवाद रहा है गौरतलब है कि तलत अजीम के साथ साथ राम यज्ञ द्विवेदी ने भी यहाँ से नामांकन कर दिया था लेकिन बाद में उन्होंने अपना नाम तो वापस ले लिए लेकिन अभी भी यहाँ विवाद थमा नहीं है यह लगभग निश्चित है कि तलत अजीम को भितरघात का सामना करना पड़ेगा ,साइकिल की दूकान चलाने वाले रमेश बागी कहते हैं कि तलत अजीम से बेहतर उम्मीदवार राम यज्ञ थे उनका टिकट काटकर अच्छा नहीं किया गया। भाजपा में भी संजय गुप्ता को टिकट देने को लेकर छिड़ा विवाद अभी थमा नहीं है,केशव प्रसाद मौर्या का पुतला फूंके कुछ ही दिन हुए हैं । चायल में विकास हमेशा से चुनावी मुद्दा रहा है ,हर गली मोड़ चौराहों पर विकास और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की बातें कहने सुनने को मिलती है। विकास की भूख इस कदर  है कि कई गाँवों में ऐसे लोग भी मिलते है जो कहते हैं वोट उसी को मिलेगा जो स्टाम्प पेपर पर लिख कर देगा कि हम यह यह काम करायेंगे। रोजगार की कमी एक बड़ा मुद्दा है। चायल  के मजदूर समूचे उत्तर भारत में रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। चायल  के युवाओं के लिए चुनाव अलग किस्म की चीज है रामसेवक राम  कहते हैं कि इस बार चुनाव लड़े नहीं जाएंगे, खेले जायेंगे। एक बेलौस और बेखौफ अंदाज में जिन्दगी बसर करनेवाले चायल के रहवासी  के लिए संसार की सब क्रियाएं खेल हैं जिसे वह बहुत दिल से खेलता है,इनमे चुनाव भी शामिल है। छात्र  इंजिनयरिंग और मेडिकल कालेजों की मांग करते हैं। ढेर सारी उम्मीदें हैं चायलवासियों को अगली विधानसभा से ,यह उम्मीदें पहले भी थी ,आगे भी रहेंगी।
 

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