जात जुलाहा नाम कबीरा हम तो जात कमीनो 

Awesh Tiwary

Publish: Jun, 20 2017 09:23:00 (IST)

Varanasi, Uttar Pradesh, India
जात जुलाहा नाम कबीरा हम तो जात कमीनो 

जात जुलाहा नाम कबीरा हम तो जात कमीनो 

                                                                              कबीर जयंती पर विशेष 

आवेश तिवारी 
वाराणसी।  बनारस शहर के कबीरचौरा मोहल्ले में भीड़ पिछले दो दशकों में बढ़ी है। चौरे की शुरुआत में पिपलानी कटरा है यही कबीर मठ भी है ।जब पीएम मोदी बनारस से चुनाव जीते तो चौराहे पर कबीर की उनकी संगत के साथ कुछ पत्थरों से बनी मूर्तियाँ लगा दी गई ।जब भाजपा का कोई बड़ा नेता बनारस आता है तो इस इलाके को भगवा झंडे से घेर दिया जाता है। युग बदला वक्त बदला लोग बदले ,कबीर की बातें भी  खूब हुई उन्हें पढ़ा और गाया भी खूब गया। लेकिन केवल बनारस शहर ही ऐसा रहा जहाँ कबीर का निर्गुण आम बनारसी के स्वभाव में रच बस गया। शायद यही वजह है कि बनारस में न तो दंगे होते हैं न ही यहाँ के हिन्दू मुस्लिमों के बीच कभी कोई विवाद होता है। बनारस के लिए कबीर विशेष है लेकिन कबीर दास आम मनुष्यों के साथ साथ खुद भी शहरों के उंच नीच को नहीं मानते थे ।यह आश्चर्यजनक है कि लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए बनारस आते हैं लेकिन जब कबीर की मृत्यु का वक्त नजदीक आया वो मगहर चले गए। जबकि मगहर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ पर जिसकी मृत्यु होती है वो अगले जन्म में गदहा बन जाता है। 

जाति न पूछो साधु की
कबीर की मृत्यु के बाद की एक कहानी बनारस में बेहद लोकप्रिय है। बताया जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद हिन्दुओं और मुस्लिमों में उनके शव को लेकर ठन गई। मुस्लिम उनके शव को दफनाना चाहते थे लेकिन हिन्दू चाहते थे कि उनका रीति रिवाज से अंतिम संस्कार हो ।लेकिन जब यह झगडा बढ़ा तो कबीर का शरीर फूलों के ढेर में बदल गया ।जिसे हिन्दू मुसलामानों ने आधा आधा बाँट लिया। जहाँ तक कबीर की जाति का सवाल है  कबीर दास ने अपनी जात के बारे में ज्यादातर जुलाहा शब्द का प्रयोग किया है लेकिन खुद को कभी कभी कोरी और कमीना भी बताया है। गौरतलब है कि बनारस में अब भी हिन्दू बुनकरों को कोरी कहा जाता है और अस्पृश्य समझे जाने की वजह से उन्हें कमीना भी कहा जाता है। कबीर ने अपनी वर्ग स्थिति को कभी नहीं भुलाया एक पद में जब माया लाल सिंगार करके उनके पास आती है और उन्हें अपना पति कहती है तो वो कहते हैं कि मेरे पास क्यों आती हो ? मेरा नाम कबीर है और जात जुलाहे की है तुम वहां जाओ जहाँ बाग़ सजे हुए ,चन्दन घिसे जा रहे हैं रेशम की भरमार है और अनाज की भरमार है, हमारे पास आकर क्या करोगी हम तो कमीनों की जात से सम्बन्ध रखते हैं। 

हिंदी  भाषा के सबसे बड़े कवि थे कबीर 
कबीर को बेहद नजदीक से समझने वाले पेंटर धीरेन्द्र कहते हैं 'कबीर एक मुसलमान सूफी थे जो हिन्दुओं की भाषा में बात करते थे ।चूँकि उन्होंने खुद को बार बार जुलाहा कहा है इसलिए यह तय है कि उन्होंने इस्लाम का पूरी तरह से परित्याग नहीं किया था ।लेकिन उनकी सज धज हिन्दुओं की सी थी वो माथे पर तिलक लगाते थे और शरीर पर जनेऊ पहनते थे और साहस तो इतना था कि उस वक्त में जब ब्राह्मणवाद चरम पर था वो ब्राह्मणों पर  व्यंग्य कर लेते थे उन्होंने ही लिखा कि तू ब्राह्मण मैं कासी का जुलाहा, बूझो मोर गियाना '। कबीर की कविता में फ़ारसी और उर्दू के सैकड़ों शब्द आते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कबीर से पहले हिंदी भाषा ने कोई बड़ा कवि  पैदा नहीं किया इतिहासकार मानते हैं कि कबीर एक अच्छे पाठक भी थे ।

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