सार्थक कला- संवाद और सरोकार

Pawan Rana

Publish: Mar, 17 2017 03:38:00 (IST)

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सार्थक कला- संवाद और सरोकार

आधुनिक कला भावों का निरूपण

- चन्द्रकान्ता शर्मा

आधुनिक चित्रकला का भाव सम्प्रेषण सदैव विवादों से घिरा रहा है तथा इसकी संरचनाएँ जटिलतम परिवेश की रचना करती रही हैं। समकालीन कला आंदोलन ने चित्रकला का अमूर्त स्वरूप स्थापित किया तथा एक ऐसा समृद्ध वातावरण भी
सौंपा, जो चित्रकारों में परिवेश की परम्परा से दरकिनार कर नये भाव बोधों को समेटने वाला था।

यह अवश्य था कि आधुनिक कला में मूर्त रूप भी अमूर्तता के साथ प्रस्तुत था तथा जीवनवत सच्चाइयाँ ही उसका मुख्याधार थी, ऐसे समय में जब नवीन प्रयोगों के माध्यम से चित्रफलक रंगों के जाले में अमूर्तता तथा रूखापन लिए हुए थे तब ही चित्रकारों की एक पीढ़ी चित्रकला में सार्थकता की तलाश में व्यस्त थी। इस पीढ़ी के चित्रकार अपने समाज की  संस्कृति तथा परम्परा से हटने की बजाय एक ऐसे तालमेल के प्रति सचेष्ट रहे जिससे कला के प्रति जनाकर्षण बना रहे तथा उसमें सार्थक संवाद को खोजा जा सके। इसी संवाद से आधुनिक कला में यह विवाद भी सघनता लेने लगा कि कला का देखना ही भला है अथवा उसमें किसी सार्थकता का होना भी जरूरी है।

कलादीर्घाओं में जो स्थापित चित्रकारों से लेकर नयी पीढ़ी के चित्रकारों का काम देखने में आया उसमें सबसे बड़ी समस्या यह रही कि शैली की विविधता के बावजूद रंग और रूपकाकार एक जैसे थे तथा यह पता करना मुष्किल था कि उसमें मौलिकता किस कोण से देखी-परखी जावे। चित्रफलकों के आकार भले छोटे और बड़े रहे लेकिन रंगों के बादल तथा रेखाओं के जाले परिदृश्य की उपस्थिति दर्ज कराते रहे, जिन रूपाकारों ने आकार को अमूर्तता के साथ परम्परा और संस्कृति के भाव से निरूपित किया, वे जरूर कोई सार्थक संवाद के संवाहक बने। तब ही कलादीर्घा से यह शोर उठा कि आधुनिक कला में भाव निरूपण अनिवार्य है। हालांकि चित्रकारों ने इसकी परवाह नहीं कि तथा चमत्कारिक तथा क्षणिक आवेगवान चित्रफलकों की रचना में रत रहे लेकिन एक समय ऐसा आया जब उन्हें स्वयं को लगने लगा कि वे समाज के संवाद से कट रहे हैं तथा मनुष्य चेतना को जड़ करने से वे संवेदन शून्यता की और बढ़ रहे हैं तब उन्होंने अपने को साधा तथा परिवेष से जुडऩे के लिए सजग और सचेष्ट हुए, वैसे तो आज भी चित्रकारों की एक पीढ़ी रंगों का जादू तथा रेखाओं का चमत्कार उत्पन्न कर दर्षकों को लुभाने तथा उलझाने में लगी है।

लेकिन भाव सम्प्रेषण की समस्या को जिन लोगों ने गंभीरता से लिया वे उसमें सक्रियता से आगे बढ़े तथा सार्थक पहचान के हकदार भी बन गये। तब सहज ही यह प्रष्न बना कि सार्थकता के बिना किसी चित्र में प्राण नहीं आ सकता तथा इसमें निरंतर सुधार और परिष्कार की आवश्यकता है। इसका परिणाम वैसे तो दूरगामी है और अभी किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता परन्तु एक शुरुआत जो दिखाई दे रही है उससे लग यही रहा है कि इसका परिणाम शुभ रूप में मिलेगा।

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