बड़ी होने का रखें ख़ास ख्याल

Jameel Khan

Publish: Jul, 17 2017 04:27:00 (IST)

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बड़ी होने का रखें ख़ास ख्याल

हम दोनों बहने डर के मारे वहां से भाग कर अपने नाना के घर जा कर दुबक कर बैठ गई, जो कि हमारे घर के पास ही था

बात उन दिनों की है जब हमारे घर में सफेदी और रंगाई पुताई का काम चल रहा था, मेरो आयु करीब दस वर्ष की होगी,,मेरे मम्मी पापा कुछ जरूरी काम से घर से बाहर गए हुए थे, पूरे घर का सामान बाहर आँगन में बिखरा हुआ था, घर के सभी कमरे लगभग खाली से थे और मेरे छोटे भाई बहन मस्ती में एक कमरे से दूसरे कमरे में छुपन छुपाई खेलते हुए इधर उधर शोर शराबा करते हुए भाग रहे थे, लेकिन मै सबसे बड़ी होने के नाते अपने आप को उनसे अलग कर लेती थी, उन दिनों मुझे फ़िल्मी गीत सुनने का बहुत शौंक हुआ करता था, बस जब भी समय मिलता मै रेडियो से चिपक कर गाने सुनने और गुनगुनाने लग जाती थी, उस दिन भी मै रेडियो पर कान लगाये गुनगुना रही थी।

उस कमरे में सामान के नाम पर बस एक ड्रेसिंग टेबल और एक मेज़ पर रेडियो था जहां खड़े हो कर मै अपने भाई बहनों की भागम भाग से बेखबर मे संगीत की दुनिया में खोई हुई थी, तभी बहुत जोर से धड़ाम की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया, आँखे उठा कर देखा तो ड्रेसिंग टेबल फर्श पर गिर हुआ था और उस खूबसूरत आईने के अनगिनत छोटे छोटे टुकड़े पूरे फर्श पर बिखर हुए थे।

वहां उसके पास खड़ी मेरी छोटी बहन रेनू जोर जोर से रो रही थी, ऐसा दृश्य देख मेरा दिल भी जोर जोर से धडकने लगा था, मै भी बुरी तरह से घबरा गई थी, एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा कहीं रेनू को कोई चोट तो नही आई, लेकिन नही वह भी बुरी तरह घबरा गई थी, क्योकि वह खेलते खेलते ड्रेसिंग टेबल के नीचे छुप गई थी और जैसे ही वह बाहर आई उसके कारण ड्रेसिंग टेबल का संतुलन बिगड़ गया और आईना फर्श पर गिर कर चकना चूर हो गया था।

हम दोनों बहने डर के मारे वहां से भाग कर अपने नाना के घर जा कर दुबक कर बैठ गई, जो कि हमारे घर के पास ही था, कुछ ही समय बाद ही वहां पर हमारी मम्मी के फोन आने शुरू हो गए और फौरन हमे घर वापिस आने के लिए कहा गया, मैने रेनू को वापिस घर चलने के लिए कहा परन्तु वह डरी हुई वहीं दुबकी बैठी रही, बड़ी होने के नाते मुझे लगा कि हम कब तक छुप कर बैठे रहें गे, हौंसला कर मै घर की और चल दी और मेरे पीछे पीछे रेनू भी घर  ञ् गई।

जैसे ही मैने घर के अंदर कदम रखा एक ज़ोरदार चांटा मेरे गाल पर पड़ा, सामने मेरी मम्मी खड़ी थी। मै हैरानी से उनका मुहं देखती रह गई, ''यह क्या गलती रेनू ने की और पिटाई मेरी ''बहुत गुस्सा आया मुझे अपनी माँ पर जबकि गलती मेरी छोटी बहन से हुई थी, बहुत रोई थी उस दिन मैं।" आज जब भी मै पीछे मुड़ कर उस घटना को याद करती हूँ तो फर्श पर बिखरे वो आईने के टुकड़े मेरी आँखों के सामने तैरने लगते है और अब मै समझ सकत ी हूँ कि अपने मम्मी पापा की अनुपस्थिति में बड़ी होने के नाते मुझे अपने घर का ध्यान रखना चाहिए था, मुझे अपनी बहन रेनू को ड्रेसिंग टेबल के नीचे छुपने से रोकना चाहिए था। वह चांटा मुझे मेरी लापरवाही के कारण पड़ा था। उस चांटे ने मुझे जीवन में अपनी जिम्मेदारी का अर्थ समझाया था।

- रेखा जोशी

- ब्लॉग से साभार

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