विशेषः अखिलेश-शिवपाल का दंगल- सियासी लाभ लेने का ड्रामा या वर्चस्व की जंग

विशेषः अखिलेश-शिवपाल का दंगल- सियासी लाभ लेने का ड्रामा या वर्चस्व की जंग
akhilesh and shivpal

साल 2016 में यूपी की राजनीति में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव का विवाद खबरों में छाया रहा

अमित शर्मा, नई दिल्ली/नोएडा। उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच हुई कलह अभी भी खत्म नहीं हुई है. चुनाव के बिलकुल नजदीक आ जाने के बीच शुक्रवार को ही अखिलेश ने अपने खास माने जाने वाले तकरीबन सौ विधायकों के साथ अपने आवास पर मुलाकात कर एक बार फिर चाचा शिवपाल के साथ हुई लड़ाई के अगले पायदान पर जाने का संकेत दे दिया. साथ ही यह माना जा रहा है कि अखिलेश यादव ने यह सब महज यह दिखाने के लिए किया कि अगर उनके खास वर्तमान विधायकों को टिकट देने से रोका गया तो मामला बिगड़ सकता है.

चाचा ने फिर दिखाया ताव


वहीं दूसरी ओर चाचा शिवपाल एक बार फिर ताव देते हुए शनिवार को ही ये संकेत दे दिए कि पार्टी पर उनकी पकड़ अभी भी बनी हुई है और यहां वहीं होगा जो वो चाहेंगे. उन्होंने इस बात के भी संकेत दिए कि जो भी अखिलेश यादव के करीबी हैं, उनका टिकट कटना तय है. इस पूरी जोर आजमाइश को इस नजर से देखने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि अखिलेश और शिवपाल के बीच की यह लड़ाई नूराकुश्ती से अधिक कुछ भी नहीं है. 


ड्रामा करते आए हैं मुलायम

दरअसल ऐसा कहने के पीछे तर्क यह है कि मुलायम सिंह पहले भी इसी तरह की सियासी ड्रामेबाजी करते आये हैं. ऐसी ही ड्रामेबाजी कर वे चौधरी चरण सिंह की जमीनी सियासत हड़पते हुए खुद उत्तर प्रदेश के चेहरे बन गए और अपने अन्य सभी साथियों को किनारे लगा दिया था. आज की सियासत में मुलायम सिंह को इस बात की अच्छी जानकारी है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं की सरेआम गुंडागर्दी और प्रदेश में लगातार कानून की उड़ रही धज्जियों से सपा की इमेज बहुत खराब है. चुनाव जीतना तो दूर सौ के आंकड़ें को पर करना भी मुश्किल होगा.

अखिलेश को ब्रांड बनाने का प्रयास

ऐसे में सपा के इस पुराने मंजे खिलाड़ी ने अखिलेश को साफ-स्वच्छ छवि का ब्रांड अंबेसडर बनाने की पूरी कोशिश की. इसके लिए अखिलेश के नाम के ब्रांड की वस्तुएं जनता के बीच बंटवाई और लगातार विकास की नई योजनाओं के उदघाटन करवाए. बुन्देलखण्ड में अखिलेश और सपा के नाम से राहत सामग्री बंटवाई गयी और दूसरे क्षेत्रों में उन्हीं के हाथों लैपटॉप देकर यह सन्देश देने की कोशिश की गयी कि वह विकास के साथ हैं. 


साफ छवि की ललक


वहीं, बीच-बीच में अखिलेश का यह बयान आता रहा कि वे प्रदेश में विकास की राजनीति करना चाहते हैं तो इसके पीछे यही सोच काम कर रही थी. बीच-बीच में अखिलेश के द्वारा सपा में मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे अपराधी छवि के नेताओं से दूरी दिखाने की भी कोशिश की गयी. अखिलेश ने अतीक अहमद से भरी सभा में हाथ मिलाने तक से साफ दूरी बरतते हुए दिखाई देना अखिलेश की अपराध और अपराधियों से दूर स्वच्छ छवि बनाने की ओर बढ़ा कदम ही था.

चुनाव में बदलता गणित

इस बीच मुलायम सिंह को यह मालुम है कि ये सब चीजें दिखाने के लिए तो बहुत अच्छी होती हैं लेकिन चुनाव जीतने के लिए कुछ जमीनीं हकीकत के हिसाब से चीजों के गणित बिठाने होते हैं. कम से कम यूपी की सियासत जाति और धर्म के आधार पर होती है. इसलिए उसके लिहाज से उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद की जरूरत है. यही कारण है कि चाचा शिवपाल और अखिलेश की लड़ाई के पीछे बड़ी ही चालाकी से यह सवाल गायब कर दिया कि अगर अखिलेश के विकास के दावों में इतना ही दम है तो उन्हें जीत के लिए अपराधियों की जरूरत क्यों है.


चली ये चाल


चाचा-भतीजे की लड़ाई के बीच कौमी एकता दल का सपा में विलय कर लिया गया. बचाव के लिए यह रास्ता भी तैयार रखा गया कि मुख्तार अंसारी को पार्टी में जगह नहीं दी गयी है, बल्कि उनके भाई जो कि साफ-स्वच्छ छवि के हैं और वर्तमान कौमी एकता दल के अध्यक्ष हैं, उन्हें साथ लिया जा रहा है. अंततः दोनों ही बड़े अपराधी सपा में दाखिल कर लिए गए.

पहले हटाया फिर मिलाया


यानि एक तरफ तो मुलायम-अखिलेश को विकास का रहनुमा साबित करने में कामयाब हो गए और वहीं दूसरी ओर अपराधी भी सपा में शामिल भी हो गए. इसके साथ ही कभी झगड़े की जड़ रहे अमर सिंह, रामगोपाल यादव और अखिलेश के अन्य विरोधी जिसे पहले पार्टी से हटाया गया था। धीरे-धीरे सभी सपा में वापस हो गए. इन सबसे तो यही साबित होता है कि अखिलेश और शिवपाल की लड़ाई दरअसल सपा की सियासी जरूरत थी. लेकिन जनता इस पर किस तरह अपनी राय व्यक्त करती है, इसके लिए तो चुनाव के नतीजों का इंतजार करना पड़ेगा.
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