अगर चौधरी साहब होते तो अजीत को कर देते पार्टी से बाहर

अगर चौधरी साहब होते तो अजीत को कर देते पार्टी से बाहर
charan singh

चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन पर विशेषः अजीत सिंह की तरह अवसरवाद को पसंद नहीं करते थे चौधरी चरण सिंह

नोएडा: चौधरी चरण सिंह का पॉलिटिकल करियर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है। दो बार सीएम भी रहे और काफी कम समय के लिए रहे। वहीं देश के गृह मंत्री भी रहे तो वो भी अल्पकालीन रहा है। देश के पीएम के तौर पर भी वो काफी कम समय तक रहे। इसका रीजन उनका स्ट्रांग पॉलिटिकल स्टैंड था। वह किसी की भी गलत बात को बर्दाश्त नहीं करते थे। चौधरी चरण सिंह को करीब से जानने वालों की मानें तो, अगर आज चौधरी साहब जिंदा होते तो छोटे चौधरी को पार्टी से बाहर कर देते। अजीत और अब उनका बेटा जयंत कभी उनके बराबरी नहीं कर सकते हैं।

अवसरवादी नहीं थे चरण सिंह

छपरौली के निवासी प्रीतम सिंह (95 वर्ष) बताते हैं कि उनके जैसा तो उनके पूरे परिवार में कोई भी नहीं हैं। वो बिल्कुल भी अवसरवादी नहीं थे। उन्होंने कांग्रेस की पॉलिसी समझ नहीं आई तो उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद प्रदेश सरकार में भी मंंत्री पद से इस्तिफा दिया। सीएम पद पर भी वो नहीं रहे। इसका एक ही रीजन था कि वो अपने सिद्धांतों के कभी समझौता नहीं करते थे। उन्होंने कहा, उनमें कभी सत्ता का लालच नहीं रहा। वो जो भी काम करते थे किसानों के हितों को सोचते हुए और सामूहिक हित को देखते हुए काम करते थे। वो अवसरवादी कभी नहीं रहे।

अजीत को कर देते पार्टी से बाहर

प्रीतम सिंह कहते हैं उनके बेटे से उनकी तुलना करना बेकार है। जिस तरह की राजनीति अजीत सिंह ने अभी तक की है चौधरी साहब आज जिंदा होते तो उसे पार्टी से ही बाहर कर देते। आज के समय की राजनीति लालच से परिपूर्ण हैं। जबकि चौधरी चरण सिंह लालची नहीं थे। किराये के मकान में रहे। लेकिन आज उन्हीं की पार्टी के उनके बनाए नियमों पर नहीं चल रही है। कहने को किसानों की पार्टी रह गई है। उन्होंने कहा कि अजीत सिंह कभी किसी एक के साथ होकर नहीं रहे। उन्होंने अवसर को अपनाया। दूसरी राह पर चले। जिस कारण से वो अपने पिता के मूल नियमों और सिद्धांतों से दूर होते गए। अगर वो उन्हीं सिद्धांतों पर रहते तो किसानों में उनका रुतबा कुछ और ही होता। 2014 के चुनावों रिजल्ट कुछ और ही होता।

जयंत नहीं है अभी परिपक्व

चौधरी चरण सिंह के खास लोगों में मानें जाने वाले चौधरी जगत सिंह के अनुसार अजीत के बाद जयंत से कुछ उम्मीदें बंधी थीं। लेकिन वो भी अभी परिपक्व नहीं है। उन्हें किसानों के करीब आने के लिए किसानों को समझना होगा। किसानों के दर्द को समझना होगा। उनकी रूह तक पहुंचना होगा। जिस तरह से एक-एक गांव को चौधरी चरण सिंह ने पांव से नापा है। वैसी ही मेहनत करनी होगी। तभी जयंत वहां तक कुछ हद पहुंच सकते हैं। वहीं प्रीतम सिंह का कहना है कि कोई कितनी ही क्यों ना मेहनत कर लें। जो रुतबा चौधरी साहब का रहेगा वो रुतबा अजीत और जयंत का कभी नहीं हो सकता है।
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