कांग्रेस मुख्यालय पर इनकी हालत भी है खराब

चुनाव आयोग की सख्ती से इनकी रोजी-रोटी पर पड़ा असर

अमित शर्मा. नई दिल्ली/नोएडा. यूपी में कांग्रेस की हालत सुधरे इसकी दरकार सिर्फ कांग्रेस और कांग्रेसियों को ही नहीं, कुछ ऐसे लोगों को भी है जिनकी पहचान एक पार्टी कार्यकर्ता के रूप में नहीं होती, जिन्हें पार्टी का कार्यकर्ता ही नहीं पहचानता तो नेताओं की बात ही क्या, लेकिन एक उम्मीद लगाये ये लोग रोज पार्टी दफ्तर पहुंचते हैं, बिना नागा किए इस उम्मीद में कि कभी पार्टी की स्थिति सुधरेगी और उसी के साथ इनकी भी.



45 साल से ऊपर के हो चुके दुर्गा प्रसाद, सामान्य कदकाठी में एक सामान्य भारतीय का चेहरा लिए कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड के सामने इमली के पेड़ के नीचे एक चटाई बिछाकर बैठते हैं. उनके चारों ओर कांग्रेसी दुपट्टे, पंजे के निशान वाले झंडे, नेताओं के नाम-पते के साथ बिकने वाली डायरियां और कुछ पेन उनके आसपास सजी हैं. दुर्गा प्रसाद इन्हें बेचते हैं, यही इनकी रोजी रोटी है जो इनके पांच सदस्यों वाले परिवार को चलती है. मां, पत्नी और दो बच्चों सहित कुल पांच सदस्यों का परिवार इसी इमली के पेड़ के नीचे पंजे के निशान के सहारे गुजर बसर करता आया है. लगातार पिछले सत्रह सालों से.

पूछने पर दुर्गा प्रसाद बताते हैं कि उन्होंने सन 2000 के आसपास कांग्रेस मुख्यालय के सामने पार्टी के झंडे, बैनर, राजीव-इंदिरा के पोस्टर बेचने का काम शुरू किया था जो आज तक बदस्तूर जारी है. इस पेड़ की छांव के नीचे ही उन्होंने सरकारों को बनते-बिगड़ते देखा है और अपने सामानों की बिक्री के जरिये उसे महसूस भी किया है. अब कैसी स्थिति है, पूछने पर मुरादाबाद के रहने वाले दुर्गाप्रसाद बताते हैं कि पहले तो यहां बहुत चहल-पहल हुआ करती थी. आज वो बात नहीं है. पार्टी के सामानों की बिक्री में भारी गिरावट हुई है.

कुछ दबे स्वर में वे बताते हैं कि जब उन्होंने इस काम को शुरू किया था तब उनके साथ सोलह-सत्रह लोग इसी तरह पार्टी के सामान बेचकर अपनी जिंदगी चलाते थे, आज इनकी संख्या सिर्फ दो-चार लोगों तक सिमट कर रह गयी है. जब उन्होंने इस काम को शुरू किया था तब यूपीए के आने की उम्मीदें जवां हो रही थीं. बाद में कांग्रेस के नेत्रित्व में पार्टी के शानदार दस साल के शासन में यहाँ का माहौल जाहिर है कि अलग ही था, अब आज जबकि कांग्रेस लोकसभा में सिर्फ 44 सीटों पर सिमटकर रह गयी है और कई प्रमुख राज्यों में उसे अपनी सत्ता गंवानी पड़ी है, इस बिक्री पर भारी असर पड़ा है. कांग्रेस के प्रदर्शन का असर कांग्रेस के सहारे चलने वाले इन लोगों पर भी पड़ा है.

बेचने वालों की संख्या में इस तरह कमी क्यों आई है, पूछने पर उनके चेहरे पर वही उदासी महसूस हुई जो किसी किसान के फसल ख़राब होने पर होती है. दुर्गा प्रसाद बताते हैं कि जब सोलह-सतरह लोग यहाँ सामान बेचते थे, तब भी वे लगभग हजार रूपये की ‘अच्छी’ आमदनी कर लेते थे, आज जब दो-चार लोग मुश्किल से रह गये हैं, उनकी बिक्री इतनी भी  नहीं हो पाती कि वे परिवार का पेट भी आसानी से पाल सकें. अपने बच्चों की स्कूल फीस भी बड़ी मुश्किल से जुड़ पाती है. उन्होंने बताया कि अब तो उनकी बिक्री इतनी कम हो गयी है कि एक दिहाड़ी मजदूर भी उनसे बेहतर स्थिति में होगा. लेकिन अब इस उम्र में उन्हें कोई दूसरा काम सूझता भी नहीं. इसी उम्मीद में टिके हैं कि जल्दी ही पार्टी के दिन भी लौटेंगे और उनके भी.

पार्टी से सम्बन्धित सामानों की बिक्री में इतनी कमी क्यों आई है, पूछने पर उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग का डंडा उनके पेट पर भारी पड़ा है. उनकी ही क्यों, बड़े-बड़े दुकानदारों के पास सामान भरा पड़ा है, लेकिन उसे लेने वाला कोई नहीं. चुनाव आयोग ने चुनाव खर्च की सीमा ही नहीं तय की, दुर्गा प्रसाद जैसे लोगों के मुंह में जाने वाले निवालों की संख्या भी तय कर दी है. आखिर लोकतंत्र इन ‘दुगाप्रसादों’ के लिए ही तो होता है, जाहिर है कि उन्हें इसकी कीमत भी तो चुकानी पड़ेगी.

क्या नोटबंदी से भी उनकी बिक्री पर असर पड़ा है, यह पूछने पर उनके एक साथ खड़े एक दूसरे व्यक्ति ने हाँ में जवाब दिया, लेकिन पलक झपकते ही दुर्गा ने उनकी बात से साफ़ इनकार किया. कहते हैं, नोटबंदी से उनके काम पर कोई ख़ास असर पड़ा होगा, उन्हें ऐसा नहीं लगता, लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. आखिर नोटबंदी से बाकी के सारे खर्चे तो नहीं रुके, फिर उनके झंडों पर ही सारा कहर क्यों टूट पड़ता.

अब भी लोग उनकी दुकान के पास आकर रुकते हैं, लेकिन बिक्री के नाम पर राहुल और प्रियंका के पोस्टर ही ज्यादा बिकते हैं, जाहिर है कि कार्यकर्ताओं को अब उम्मीद सिर्फ इसी युवा पीढ़ी से है. लेकिन ये उम्मीद भी दुर्गाप्रसाद की बिक्री दो-तीन सौ रूपये से अधिक की नहीं होने देती. आखिर कार्यकर्ता भी अपनी पॉकेट देखकर ही खर्च करता है. और उसका यह खर्च भी कुछ उम्मीदों पर ही घटता-बढ़ता रहता है. सो, इन सबको कांग्रेस के ‘अच्छे दिन’ आने की उम्मीद है.
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