जलपुरुष ने बताया, क्यों पड़ रहा बुंदेलखंड में सूखा

मानव आबादी के दो गुने के हिसाब से जल का दोहन बढ़ रहा है, जिसके कारण जल संकट की स्थिति पैदा हो रही है

नोएडा/दिल्ली। 'गंगा-यमुना के देश में आज पानी के लिए कत्ल हो रहे हैं। पीने के पानी की कमी से बच्चे दम तोड़ रहे हैं और सिंचाई के लिए पानी की कमी से खेत बंजर हो गए हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि देश और समाज जल के इस संकट को समझे और इसके स्थाई समाधान की राह तलाशे। अगर समय पर ऐसा नहीं हुआ तो यह अकाल हमारी मानव सभ्यता पर भारी पड़ेगा।' ऐसा मानना है जल पुरुष के नाम से प्रसिद्घ राजेन्द्र सिंह का।

उन्होंने कहा कि सूखा पूर्णतया मानव निर्मित है। विकास की दौड़ में इंसान ने अपने ही आत्मघाती कदम से यह स्थिति उतपन्न की है। उन्होंने कहा कि एक अच्छी योजना के साथ चलने के बाद ही इस परिस्थिति से छुटकारा पाया जा सकता है। मानव आबादी के दो गुने के हिसाब से जल का दोहन बढ़ रहा है जिसके कारण इस तरह की स्थिति पैदा हुई है।

सूखे की विकट समस्या


देश के लिए सूखे की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। राजेन्द्र सिंह बताते हैं कि आज देश के ग्यारह राज्यों में भयंकर सूखा पड़ा है। लगभग आधा भारत इसकी मार झेल रहा है। सूखे के कारण अनेक आर्थिक-सामाजिक और नैतिक समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं जो गम्भीर प्रश्न उठा रही हैं। देश का अन्नदाता किसान अब मजदूर में तब्दील होता जा रहा है जिसे किसी भी हालात में बचाये जाने की जरूरत है।

यह भी पढ़ें : कैलाश सत्यार्थी बोले, सूखे को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाए

पारंपरिक तालाबों के खात्मे से तबाह बुंदेलखंड


उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसे बुंदेलखंड इलाके में पानी की वही किल्लत है, जो लातूर और विदर्भ जैसे क्षेत्र में है। इस क्षेत्र में पानी के लिए संघर्ष कर रहे संजय सिंह बताते हैं कि हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि इस क्षेत्र की बड़ी आबादी पलायन कर मजदूर बनकर जीवनयापन करने को मजबूर हो गर्इ है। किसानों के आत्महत्या करने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

क्यों आ रहा सूखा


उन्होंने कहा कि बुंदेलखण्ड क्षेत्र में लगभग 12000 तालाब हुआ करते थे। आज उनमें से सिर्फ 1300 तालाब ही शेष बचे हुए हैं। बाकी तालाब या तो भूमाफियाओं के चंगुल में आकर रिहाइशी कॉलोनियों में तब्दील कर दिए गए या किसी के फार्म हाउस में बदल गए। संजय सिंह ने पत्रिका को बताया कि इन बचे तालाबों में भी तीन सौ से अधिक ऐसे हैं, जिनमें वर्षा का जल पहुंच ही नहीं पाता। इसका कारण है कि इन तालाबों के आसपास की जमीन पर कब्जा कर उन्हें बांध दिया गया है, जिसके कारण बारिश का पानी तालाबों में इकट्ठा होने की बजाय इधर-उधर बहकर नष्ट हो जाता है। इससे सूखे के समय के लिए पानी इकट्ठा नहीं हो पा रहा है।

सरकारी कानून नाकाफी


बुंदेलखंड क्षेत्र में पिछले बीस वर्षों से जल चेतना जागृत करने की अलख जगा रहे संजय सिंह ने बताया कि केंद्र और यूपी-मप्र की सरकार इस क्षेत्र में काम तो कर रही हैं, लेकिन वे बिल्कुल ही नाकाफी हैं। उन्होंने बताया कि सरकार ने इस क्षेत्र में सूखे से निपटने के लिए 7200 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की थी। इस धन से पुराने तालाबों का जिर्णोद्धार किया जाना था और नए तालाब बनाए जाने थे। लेकिन इस बड़ी रकम का बड़ा हिस्सा उपयोग में ही नहीं लाया गया। इसके आलावा जो तालाब बने भी वो सिर्फ कागजों पर बने और जमीन पर कोई काम नहीं हुआ। इससे सूखे की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गर्इ।

18 लाख किसान बन गए मजदूर


उन्होंने बताया कि 2002 से लेकर 2016 तक के बीच में आठ बार सूखा पड़ चुका है। इसके कारण क्षेत्र में कृषि पर  बहुत बुरा असर पड़ा है। सूखे की इस मार ने 18 लाख किसानों को मजदूर बनने पर विवश कर दिया है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में 75 ब्लॉक हैं जिनमें से 65 ब्लॉक में पीने के पानी के लिए खून बहने की स्थिति पैदा हो गर्इ है।

कैसे बच सकता है बुंदेलखंड

दशकों से बुंदेलखंड क्षेत्र में काम कर रहे संजय सिंह बताते हैं कि यह क्षेत्र अधिकतर पहाड़ी है और इसके विकास की योजना अन्य क्षेत्रों से अलग होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यहां सरकार और समाज को एक साथ आकर तालाबों को बचाना पड़ेगा। बारिश के पानी की एक-एक बूंद के संचयन के बाद ही इस क्षेत्र को सूखे से बचाया जा सकता है।

जल कानून की मांग

राजेंद्र सिंह ने बताया कि वे 5 मई को दिल्ली के जंतरमंतर पर एक प्रदर्शन कर सरकार से जल कानून लाने की मांग करेंगे। उन्होंने कहा कि वे सरकार से इस बात की अपील करेंगे कि भोजन सुरक्षा अधिनियम की तर्ज पर जल सुरक्षा अधिनियम लाए। जलाशयों और नदियों के क्षेत्र का आधिकारिक सीमांकन होना चाहिए, जिससे उसका अतिक्रमण न किया जा सके। उन्होंने फाॅरेस्ट एक्ट की तर्ज पर वाटर एक्ट लाकर नदियों-तालाबों के क्षेत्र को सुनिश्चित करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि सरकारें खुद ही लैंड यूज बदलकर नदियों के क्षेत्र में रिहायशी कॉलोनी या कुछ अन्य बनाने की इजाजत दे देती हैं जिससे जल क्षेत्र संकुचित हो जाता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के कानून बनने चाहिए जिससे कोई चाहकर भी जल क्षेत्र के लैंड यूज न बदल सके।
Show More
Archana Sahu
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned