सामाजिक सक्रियता का मर्म न समझने की भूल और 5जी

अतीत की शोहरत की तलछट का लाभ लेने व न्यायिक दांव-पेच से खबरों में बने रहने की कोशिश नहीं है एक्टिविज्म

By: सुनील शर्मा

Published: 15 Jun 2021, 11:34 AM IST

- संदीप गोयल, मीडिया और विज्ञापन जगत में ख्यात नाम

देश में 5जी प्रौद्योगिकी लाए जाने के खिलाफ अभिनेत्री जूही चावला की ओर से दायर मुकदमे को हाल ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने न केवल त्रुटिपूर्ण बताते हुए तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, बल्कि अभिनेत्री पर 20 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने निर्देश दिए कि इन रुपयों से सडक़ दुर्घटना के शिकार लोगों की मदद की जाए। अदालत ने टिप्पणी की कि याचिका पब्लिसिटी के लिए दायर की गई।

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जूही चावला ने अपनी दलील में कहा कि सरकार का दायित्व है वह जनता को आश्वस्त करे कि 5जी से स्वास्थ्य, जीवन, वयस्कों के अंगों व वर्तमान या भावी पीढ़ी/ पीढिय़ों के बच्चों के साथ, वनस्पतियों व जीव-जंतुओं पर भी प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। याचिका में वैज्ञानिक अध्ययन के हवाले से दलील दी गई कि त्वरित व व्यापक सेवा प्रदान करने वाले नेटवर्क सेवा प्रदाताओं की स्पद्र्धा के चलते जनता पहले ही एक ‘अदृश्य शत्रु’ से जूझ रही है, जो उसे धीरे-धीरे मौत के मुंह में धकेल रहा है। भारत में रेडियो फ्रीक्वेंसी विकिरण पर कोई अध्ययन नहीं किया गया है और इस विषय पर ‘दक्षतापूर्ण अनुसंधान’ की जरूरत है।

सवाल है कि जूही सामाजिक कार्यकर्ता कब बन गईं? उनके आधिकारिक फेसबुक पेज पर लिखा है- ‘अभिनेत्री, मां, उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता...।’ हालिया खबरों में जूही को ‘पर्यावरणविद्’ बताया गया। दरअसल टेलीकॉम क्षेत्र में जूही की सक्रियता कोई नई बात नहीं है। सितंबर 2018 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि टेलीकॉम टॉवरों से फैलता विकिरण जन स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। केंद्र को निर्देश दिए जाने चाहिए कि वह क्षेत्रवार टॉवर घनत्व की सीमा निर्धारित करे। टॉवरों से उस क्षेत्र में जो विद्युत चुम्बकीय विकिरण पैदा होता है, वह मानव के लिए कैंसर सहित कई स्वास्थ्य जोखिमों का कारण बन सकता है। ऐसा क्या हुआ जो उनकी 5जी संबंधी याचिका खारिज कर दी गई और सोशल मीडिया पर उनका उपहास हो रहा है?

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काश! जूही ने प्रख्यात पत्रकार बिल मोयर्स की सलाह पर गौर किया होता कि सामाजिक बदलाव लाने के लिए कार्यकर्ता को चार भूमिकाएं निभानी होती हैं-नागरिक, बागी, बदलाव का एजेंट और सुधारक। हर भूमिका का उद्देश्य, स्टाइल, कौशल और आवश्यकता अलग है। इन्हें कुशलता से भी निभाया जा सकता है और अकुशलता से भी। सामाजिक कार्यकर्ता की छवि एक जिम्मेदार नागरिक की होनी चाहिए। आंदोलन की सफलता के लिए उन्हें ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच सम्मान और अपनी स्वीकार्यता अर्जित करनी होती है। दुर्भाग्य से जूही ने कभी जनसाधारण की परेशानियों के लिए लडऩे में समय का निवेश नहीं किया। जूही चावला से यही चूक हुई कि वह जो मामला कोर्ट में ले गईं, उसके लिए जरूरी विश्वसनीयता हासिल ही नहीं की।

टेलीकॉम क्षेत्र में जूही का हस्तक्षेप मुख्यत: न्यायिक रहा है, जो उनके गंभीर न होने का संकेत है। जूही ने संभवत: गंभीरता से विचार नहीं किया कि सामाजिक सक्रियता, आराम-कुर्सी पर बैठकर अतीत की शोहरत की तलछट का लाभ लेने और न्यायिक दांव-पेच से खबरों में बने रहने की कोशिश नहीं है। उन्हें दिवंगत अभिनेता सुनील दत्त के जीवन से सबक लेना चाहिए जिन्होंने अपने अजंता आर्ट ट्रूप के जरिए पत्नी नरगिस के साथ सीमाओं पर जवानों का हौसला बढ़ाया और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए पदयात्राएं कीं द्ग 1987 में मुंबई-अमृतसर, तो १९९९ में 17,000 किलोमीटर का सार्क अभियान। ये वे कार्य हैं जिन्हें न ब्रांडिंग की जरूरत है, न बेचने की। जरूरत है बस सलाम करने की। संभव है जूही समझ गई होंगी कि सामाजिक सक्रियता के लिए कठोर परिश्रम की दरकार होती है।

(पूर्व में ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ में प्रकाशित।)

सुनील शर्मा
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