शब्दों का दरवेश : चौमासे में याद आई आल्हा की चौपाल

आल्हा के छंद वीरता और पराक्रम की अग्निशिखा है। बुंदेली के अलावा बैसवारी, अवधी, कन्नौजी, ब्रज और भोजपुरी में भी आल्हा गाने की परंपरा है।

By: विकास गुप्ता

Published: 22 Jul 2021, 10:16 AM IST

विनय उपाध्याय, (कला साहित्य समीक्षक, टैगोर विश्वकला एवं संस्कृति केंद्र के निदेशक)

डालों पे पड़े झूले, छपरी में जमी आल्हा, ढोलक को कई दिनों में थापों से पड़ा पाला.... सुर- ताल और लयकारी की इस गमक को जब भवानीप्रसाद मिश्र अपनी कविता में समेटते हैं, तो बुंदेली महक में भीगी जाने कितनी बरसातें याद आने लगती हैं। इधर चौमासे ने दस्तक दी, तो याद आई चौपाल पर आसन जमाए गायकों की मंडली। कंठ से उठती वह हुंकार भी- 'जो नर जैहो रण खेतन में, जुगों-जुगों तक चल है नाम'। आल्हा के छंद वीरता और पराक्रम की ऐसी ही अग्निशिखा है। यानी शब्द, विचार और ध्वनि की तरंगों को थामती वह गायन शैली जिसने बुंदेलखंड की धरती पर गरजते कलह के इतिहास को कंठ और स्मृति में बसाकर लोक आख्यान का नया फलसफा रच दिया। सहज ही जेेहन में कौंधती है मरहूम लोकमान्य आल्हा गायक लल्लू लाल वाजपेयी की शौर्य छवि। सिर पर लाल कलंगी - पगड़ी, माथे पर विजय तिलक, हाथ में चमकती तलवार, फड़कती भुजाएं और लरजते कंठ से फूटते रणबांकुरों की जांबाजी के किस्से। इधर रात-रात भर आसमान से मेह बरसता, उधर आल्हा की महफिल में ओज भरे बादल गरजते।

गाथाओं की गोद में गुजरे जमाने की जाने कितनी स्मृतियां अपना आसरा तलाशती हैं। वक्त गुजर जाता है, लेकिन लोक मानस के पटल पर अपने नक्श बनाती पूर्वजों की यह विरासत कहीं ठहर जाती है। आल्हा की इस अमर गाथा को रचने का श्रेय बुंदेली कवि जगनिक को जाता है। चंदेल राजा परमार के राजकवि के रूप में उनका मान था। वह वीरगाथा काल था। जगनिक ने आल्हा और उदल नाम के दो वीर चरित्रों के पराक्रम को छंद शैली में पिरोया। उनकी कविता ने बुंदेली लोक मन को इतना गहरा छुआ कि सदियां गुजर गईं, आल्हा की आवाज का असर कम न हुआ। वह पाठ और संगीत की तर्ज पर समान रूप से स्वीकार की गई। काबिले गौर यह कि गुलामी के दिनों में गोरों के खिलाफ आक्रोश पैदा करने में आल्हा ने अहम भूमिका निभाई। कहते हैं आल्हा में बावन लड़ाइयों का वर्णन है, लेकिन पंद्रह गाथाएं ही पाठ-प्रचलन में है। बुंदेली के अलावा बैसवारी, अवधी, कन्नौजी, ब्रज और भोजपुरी में भी आल्हा गाने की परंपरा है।

लोक संस्कृति के अध्येता-निबंधकार श्याम सुन्दर दुबे के अनुसार एक अंग्रेज चाल्र्स इलियट ने आल्हा की गायिकी से प्रभावित होकर उसके बिखरे कथानक को पुस्तक के रूप में संग्रहित किया था। इस किताब को दिलकुशा प्रेस फतेहगढ़ ने छापा था। आल्हा की आत्मा से गुजरो तो मालूम होता है कि यह महज कलह की कथा नहीं है। इसमें प्रेम और करुणा का मानवीय सन्देश भी है। दुर्भाग्य से आल्हा के गवैए अब सिमटते जा रहे हैं। न पहले जैसे बुंदेली देहात रहे, न पहले जैसी चौमासे की बारिशें, न वह तिश्नगी, न वह कौतूहल, न वह सुकून। हां, यादों का एक बहता दरिया जरूर है, जिसके किनारों पर बैठकर तहजीब की बहती लहरों को निहारना भला लगता है।

विकास गुप्ता
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