आपसी सहयोग से ही होगा मुकाबला

आर्थिक रुप से एक चरमरायी स्थिति में जिन्दगी को पुनःगठित करने के दुस्साहसों से जूझते हुए लोग जिन तनावों, अभावों और नकारात्मक प्रभावों के शिकार होंगे, वे उनके जीवन को बहुत मुश्किल साबित होंगे। कोरोना संक्रमण की इस विकट परिस्थिति का सामना हम एक मजबूत सहयोगात्मक सामाजिक व्यवस्था से ही कर सकते हैं।

 

By: Prashant Jha

Published: 19 May 2020, 02:39 PM IST

डॉ. राकेश राणा , समाजशास्त्री

यूएनओ के एक अनुमान के अनुसार कोरोना संक्रमण की महामारी के चलते विश्व में लगभग 2.5 करोड़ नौकरियां खत्म हो सकती हैं। महामारी के महासंकट से उभरने के बाद जो संकट पैदा होने जा रहा है। उसकी भयावहता का अनुमान लगाना और उन तनावों के समाधान सोचना भी हर जिम्मेदार सभ्य नागरिक की भूमिका बनती है। जिसके लिए वैश्विक साझेदारी की जरुरत सबको है। तभी इस संकट से उभर पाना सबके लिए संभव होगा। अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित नीति के जरिए ही वैश्विक बेरोजगारी पर कोरोना वायरस के प्रभाव को कम किया जा सकता है। अंतरर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने “कोविड-19 और कामकाजी दुनियाः प्रभाव और कार्रवाई“ शीर्षक से प्रारम्भिक मूल्यांकन रिपोर्ट जारी की जिसमें श्रमिकों की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था को मदद और रोजगार तथा आमदनी को बनाए रखने वाले समन्वित उपाय वृहद पैमाने पर करने की जरुरत महसूस की गई है। तभी विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं को संभाला जा सकता है और वैश्विक बेरोजगारी पर इसका प्रभाव कुछ कम किया जा सकता है।

बाजारों पर असर

चीन में उत्पादन की कमी के चलते पूरी दुनिया के बाजारों पर इसका सीधा प्रभाव पडे़गा। विशेषज्ञों का एक मोटा अनुमान है कि अकेले भारी क्षति है, वह है मानवीय क्षमताओं का कम होना। जिसका ग्राफ लगातार बढ़ने की स्थितियां गहराती जा रही है। कोरोना संक्रमण का यह संकट पूरे विश्व के लोगों को तनाव, कुंठा, नैराश्य और अविश्वास से भर देगा। जिससे उभरने में दुनिया को बड़ा समय लगेगा। भय और असुरक्षा ने गत कई महीनों से दुनिया में जिस तरह की स्थितियां और मनःस्थितियां बना दी है। उसकी वजह से बाजार से लेकर समाज तक कई तरह के असंतुलन दिखायी पड़ रहे है। ऑनलाइन भारतीय कंपनी ट्रेड इंडिया डॉटकॉम के अनुसार सैनिटाइज़र और मास्क की मांग 316 प्रतिशत तक की बढ़ गई है। समाज में एक भय का माहौल बन रहा है। लॉकडाउन की घोषणाओं के साथ जरुरी चीजों को लेकर जो मारी-मारी मची हुई है वह कई तरह के पेनिक और असंतुलन बढ़ा रही है।

भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग जो पहले से ही आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, उस पर चीन की मंदी का सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। भारत अपने ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए जो कल-पुर्ज़ें चीन से खरीदता है उनकी पूर्ति मुश्किल होगी। कुछ तो वहां उत्पादन की कमी के चलते दूसरे संक्रमण के भय से बचाव की रणनीति में मार्केट धीमी गति से उभरेगा। जिसका परिणाम होगा भारत के जो 3.7 करोड़ लोग ऑटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े है वे सब निश्चित रुप से प्रभावित होगें। इसी तरह भारत का ज्वैलरी उद्योग संकटग्रस्त होगा जिसके साथ एक बड़ी संख्या जुड़ी है। भारत के ज्वैलरी सेक्टर में इस मंदी का मतलब होगा क़रीब सवा अरब डॉलर का बड़ा नुक़सान। क्योंकि भारत अपने इस व्यापार का बड़ा हिस्सा चीन और हांग-कांग के साथ ही करता है।

सीधी मार

एक तो हमारी अर्थव्यवस्था पहले ही काफी दबाव झेल रही थी। अब इस महामारी की सीधी मार इसे नकारातमक ढ़ंग से प्रभावित करने वाली साबित होगी। भारत की विकास दर वृद्धि के आसार कम ही नजर आ रहे है। क्योंकि देश में महंगाई और बेरोज़गारी दोनों बढ़ेगी। जिसका परिणाम विकास दर पर नकारात्मक पड़ना ही है। भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में पूर्ण लॉकडाउन व्यापार को निम्न स्तर पर ले जा रहा है। जिसके सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम पूरी दुनियां को झेलने पडे़गें। इस संकट का एक गंभीर प्रभाव भारतीय परिवारों पर जो होगा, वह यह कि जो लोग सीधे इससे प्रभावित होगें यानि इस संक्रमण की चपेट में आयेंगें। उन्हें सामाजिक-आर्थिक परिणाम तो इसके भुगतने ही पड़ेगें, उससे भी ज्यादा जो सदमा यह संक्रमाण उन परिवारों और व्यक्तियों को देकर जायेगा उससे उभरने में उन्हें लम्बा समय लग जायेगा। वे भारी मनोवैज्ञानिक दबावों में जीनें को अभिशप्त होगें। यदि विश्व स्तर पर देखें तो यह आंकड़ा लाखों में दर्ज होता दिखायी दे रहा है। इस महामारी के जो कूटनीतिक प्रभाव नकारात्मक दिशा में दिखायी दे रहे है, वे भी कुछ नए ढ़ंग के क्षेत्रीय तनाव उभार सकते है। नए समीकरण दुनियां की महाशक्तियों को कई तरह की होड़ में डाल सकते है। जिनके प्रभाव और परिणाम पूरी दुनियां को प्रभावित करने वाले होगें। एक-देश दूसरे देश से विभिन्न तरह की अंतःक्रियाएं जिस सहज वातावरण में कर रहा था वह चेतन ढ़ंग से कई तरह के निगरानी तंत्रों को खड़ा करने की होड़ में अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त भार डालने वाली साबित हो सकती है। दुनियां में क्षेत्रीय, नस्लीय और जातीय तथा वर्गीय मनोग्रंथी बनने के पर्याप्त प्रयास विभाजनकारी शक्तियां करेंगी ही। जिसका सीधा प्रभाव कारोबार से लेकर दैनंदिन व्यवहार तक पर पड़ सकता है। जिससे विश्व समाज के तनाव में इजाफा तो होगा ही। वास्तव में यह महामारी महा परिवर्तनकारी होगी।

विकासशील देशों में यह महामारी कुछ अतिरिक्त संकट लाने वाली साबित होगी। जैसे भारत में प्रवासी मजदूरों का मामला है। यह लम्बें समय तक सामाजिक-राजनैतिक प्रभाव डालने वाला मुददा बन सकता है। जिस तरह से वह पूरा परिदृश्य उभरा और कामकाजी लोगों ने अपने आपकों असहाय और असुरक्षित सा महसूस कर स्यवं को जोखिम में डाल, लोग हजारों किमी0 सड़कों पर पैदल उतरकर अपने सुरक्षित गंतव्यों की ओर बढ़ने को विवश हुए। यह पूरा परिदृश्य भारत में सरकारों को अपना पुर्नःमूल्यांकन करने और अपनी नीतियों तथा सुरक्षा कार्यक्रमों पर पुनर्विचार को विवश करने की दिशा में दबाव बनाने वाला साबित होगा। हमें अपने शहरों को सुरक्षित और संवहनीय बनाने की दिशा में भी मजबूर करेगा। प्रवासी मजदूरों के लिए यह संकट कई तरह की विकट परिस्थितियां खड़ी करने वाला साबित हुआ। उनका रोजगार छुट गया है। उनके मन में अपने शहरों को लेकर असुरक्षा का भाव बढ़ा है। जिसका परिणाम होगा उनमें सरकारों के प्रति उदासीनता उभरेगी। गरीब वर्ग पर अपने अनायास विस्थापन और पुनःव्यवस्था का अतिरिक्त भार बढ़ेगा। आर्थिक रुप से वे एक चरमरायी स्थिति में जिन्दगी को पुनःगठित करने के दुस्साहसों से जूझते हुए जिन तनावों, अभावों और नकारात्मक प्रभावों के शिकार होगें, वे उनके जीवन को बहुत मुश्किल बनाने वाले साबित होगे। यह जीवन संघर्ष तनाव, निराशा, कलह, और कर्ज का जो एक उत्पीड़क परिदृश्य विकसित करेंगा, वह थोड़ा स्थायी तो बनेगा ही जो समाज में ढ़ेरो विकृत्तियां लायेगा। कोरोना संक्रमण समाज को गंभीर संकटों में डालने वाला साबित हो सकता है। इस विकट परिस्थिति का सामना हम एक मजबूत सहयोगात्मक सामाजिक व्यवस्था से ही कर सकते है।

Prashant Jha
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