हादसा या साजिश?

देश के रक्षा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले लम्बे-चौड़े वादों के बावजूद हर दो-तीन साल में इस तरह की अनहोनी अनेक सवाल खड़े करती है। पहला और अहम सवाल ये कि ऐसे हादसों के पीछे मूल कारण क्या हैं?

By: शंकर शर्मा

Published: 31 May 2016, 11:23 PM IST

पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर भीषण आतंकी हमले के पांच महीने बाद देश के सबसे बड़े गोला-बारूद डिपो में आग लगना करोड़ों देशवासियों के लिए चिंता का विषय है। हमने करोड़ों रुपए के हथियार और गोला-बारूद ही नहीं अपने बीस जवान भी खो दिए हैं। इतनी भीषण आग लगना एक हादसे से ज्यादा बड़ा षड्यंत्र भी हो सकता है।

जब भी ऐसा कोई हादसा होता है तो आम हिंदुस्तानी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं। यह पहला मौका नहीं है जब महाराष्ट्र में नागपुर के समीप पुलगांव में आयुध डिपो में भयंकर आग ने देश को दहलाया हो। पिछले साल विशाखापट्टनम के समीप आयुध डिपो में आग लगी थी। पांच साल पहले पश्चिम बंगाल में वद्र्धमान के समीप पानगढ़ में और उससे पहले भरतपुर, भुज और बीकानेर में भयंकर आग ने अरबों रुपये के हथियार स्वाह कर डाले थे।

देश के रक्षा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले लम्बे-चौड़े वादों के बावजूद हर दो-तीन साल में इस तरह की अनहोनी अनेक सवाल खड़े करती है। पहला और अहम सवाल ये कि ऐसे हादसों के पीछे मूल कारण क्या हैं? क्या इन्हें सिर्फ हादसों की नजर से देखा जाए या इनके पीछे कोई साजिश भी हो सकती है।

रक्षा विभाग में पिछले कुछ सालों में ऐसे जासूस पकड़े जा चुके हैं जो भारतीय सेना में होने के बावजूद पाकिस्तान के लिए जासूसी करते थे। चंद रुपयों के लालच में आकर ये जासूस देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आते। सेना के आयुध डिपो में आग लगने के पीछे भी साजिश के तार जुड़े हो सकते हैं। छोटी-मोटी आग को तो हादसा मानकर छोड़ा जा सकता है लेकिन पुलगांव का हादसा चौंकाने वाला है।

हादसे के कारणों की जांच का खुलासा भले सार्वजनिक नहीं किया जाए लेकिन इसके पीछे साजिश के ताने-बाने के तमाम पहलुओं को खंगाला अवश्य जाना चाहिए। भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी चाह ने आज नैतिक मूल्यों को तार-तार करके रख दिया है। देश की सुरक्षा की प्रतिज्ञा करने के बावजूद चंद लोगों को अपना ईमान बेचने में शर्म नहीं आती। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जांच का दायरा बढ़ाए जाने की जरूरत है।

जो हो गया उसे टाला नहीं जा सकता लेकिन भविष्य में फिर ऐसा हादसा ना हो इसके लिए तो जरूरी कदम उठाए ही जाने चाहिए। इस बारे में दूसरे देशों से सीख लेने में भी शर्म महसूस नहीं होनी चाहिए। अमरीका और उस सरीखे विकसित देशों से इस तरह हादसों की खबरें नहीं आती हैं इसके पीछे भी कुछ तो ठोस कारण होंगे ही। यदि हमने पिछले सालों में हुए आधा दर्जन हादसों से कोई सबक नहीं सीखा तो आने वाला समय बड़ी कठिनाइयों का हो सकता है। हादसा भी है तो भविष्य में वैसा फिर नहीं हो, ऐसे इन्तजाम तो किए ही जा सकते हैं।
शंकर शर्मा
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