फिर से बैंकों में कतारें लगने का डर!(प्रो.अभिजीत सेन)

रिजर्व बैंक धीरे-धीरे नकद निकासी की सीमा समाप्त कर रहा है। कहा तो गया है कि 13 मार्च के बाद नकद निकासी की कोई सीमा नहीं होगी। तो क्या पर्याप्त नोट छाप लिये गए होंगे?

By: शंकर शर्मा

Published: 09 Feb 2017, 11:12 PM IST

रिजर्व बैंक धीरे-धीरे नकद निकासी की सीमा समाप्त कर रहा है। कहा तो गया है कि 13 मार्च के बाद नकद निकासी की कोई सीमा नहीं होगी। तो क्या पर्याप्त नोट छाप लिये गए होंगे? क्या उनका पर्याप्त वितरण हो सकेगा? क्या नोटबंदी पर संसद में प्रधानमंत्री के बयान और रिजर्व बैंक के फैसले में कुछ तालमेल हो सकता है..?

भारतीय रिजर्व बैंक ने घोषणा की है कि 20 फरवरी, 2017 के बाद बैंकों से एक सप्ताह में अधिकतम 50 हजार रुपए तक निकाले जा सकेंगे। यही नहीं यह पाबंदी भी 13 मार्च तक ही रहने वाली है। इसके बाद पैसा निकालने की कोई सीमा ही नहीं रहेगी। यह फैसला लेने के पीछे निस्संदेह आरबीआई का यह आशय तो छिपा हुआ ही है कि अब भारत में किसी भी तरह की मुद्रा की कमी नहीं है और यदि कुछ कमी है  तो वह भी मध्य मार्च तक समाप्त हो जाने वाली है।

हमें याद है कि 8 नवंबर, 2016 की शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 व 1000 रुपए के नोटों को प्रचलन से बाहर करने की घोषणा की थी। इसके बाद नकद मुद्रा की कमी और इससे होने  वाली परेशानियों को झेलना पड़ा। इसके करीब एक महीने के बाद सरकार की ओर से कहा गया कि परेशानी से निपटने के लिए जोरदार तैयारी चल रही है।

नोटों की छपाई जोरों पर है। तब यह भी बताया गया कि एक महीने के दौरान करीब चार लाख करोड़ की मुद्रा की छपाई हो सकी। इन आंकड़ों के आधार  हमारा अनुमान था कि यदि आरबीआई की नोट छापने की प्रेस लगातार काम करे तो 14 लाख करोड़ रुपए की मुद्रा छापने के लिए ढाई से तीन महीने की जरूरत पड़ेगी।

इसका सीधा सा अर्थ यह था कि 15 से 31 मार्च के बीच ही यह काम पूरा हो सकता है। अब आरबीआई यदि कह रहा है कि 13 मार्च के बाद बैंकों से राशि निकालने की सीमा नहीं होगी यानी उसकी तैयारी पूरी होनी चाहिए। हकीकत क्या है, यह जानकारी तो उसे ही पता होगी। अलबत्ता इतना जरूर है कि एक सप्ताह में 24 हजार की नकद निकासी की सीमा को 20 फरवरी से 50 हजार तक बढ़ाना कुछ अधिक लगता है। पता नहीं रिजर्व बैंक इसके लिए कितना तैयार है? 

यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि पूर्व में भी दावे तो बहुत किए गए कि देशभर के बैंकों और ऑटोमेटेड टैलर मशीनों (एटीएम) में राशि पहुंचा दी गई है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी। आम लोग नकद राशि के लिए परेशान हो रहे थे। भिन्न-भिन्न बैंकों के एटीएम  के आगे देश भर में लंबी-लंबी कतारें लगी हुई थीं। शहरों में तो हाल बहुत ही बुरा था। लोग कड़ाके की सर्दी में रात-रात भर वहां खड़े रहते थे। हालात तो यह भी थे कि बैंकों में भी पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं थी।

बैंकों को एक मुश्त 10 हजार रुपए देने भी भारी पड़ रहे थे। मैं आरबीआई की नोट छापने की क्षमता पर शंका नहीं करता। लेकिन, पूर्व के दावे और उनके क्रियान्वयन की हकीकत के आधार पर यह संदेह जरूर होता है कि यदि पर्याप्त मुद्रा छप भी जाए तो क्या वह बैंकों तक सही समय पर पहुंच भी पाएगी? या फिर, एटीएम से पर्याप्त मुद्रा निकाली जा सकेगी? यदि ऐसा नहीं हुआ तो आम जनता को एक बार फिर बैंकों और एटीएम के आगे कतारों में खड़ा होना पड़ सकता है।

यह अंदेशा केवल हवा-हवाई नहीं है क्योंकि मुद्रा की आपूर्ति की स्थिति का अनुमान तो लगाया जा सकता है लेकिन जिस तेजी के साथ मुद्रा की मांग बढ़ेगी, इसका अंदाजा लगा पाना काफी कठिन है। बहुत से मोटे खर्चे लोगों ने रोक कर रखे होंगे। कई लोगों को कर्जे भी चुकाने होंगे। हो सकता है कि मुद्रा की आपूर्ति को अचानक बढ़ाने से मुद्रा की मांग बहुत अधिक हो जाए। और, यह मांग इतनी अधिक हो कि अनुमानित मुद्रा आपूर्ति से भी न संभले।

सरकार को चाहिए था कि मुद्रा निकासी की सीमा को धीरे-धीरे ही बढ़ाती। अलबत्ता, आरबीआई के फैसले का समय और संसद में प्रधानमंत्री के नोटबंदी के फैसले को सही ठहराने संबंधी बयान का समय जरूर ध्यान देने योग्य है। इसे देखकर लगता है कि सरकार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि उसने बहुत ही सोच-समझकर नोटबंदी का फैसला किया था। वह यह बताना चाहती है कि उसने जो कहा था, वही किया भी है।

सरकार को यह तो पता ही था कि पांच राज्यों में विधानसभा के चुनावों की प्रक्रिया चल रही हैं, उससे कुछ महीने पहले ही नोटबंदी का फैसला आया। लेकिन, अब नकद निकासी की सीमा को बढ़ाना और फिर इसे समाप्त करने के समय पर भी ध्यान दीजिए। मतदान से पूर्व ही इसकी घोषणा की गई। ऐसा लगता है कि सरकार के उद्देश्य से प्रभावित होकर आरबीआई फैसले कर रहा है। आरबीआई सरकार का पिछलग्गू होकर काम करता लग रहा है।

इन हालात ने उसकी स्वायत्तता को लेकर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। कभी-कभी तो यह भी लगता है कि आरबीआई को पूरे मामले में राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है। यदि संसद में प्रधानमंत्री के बयान और आरबीआई की नकद निकासी की सीमा पर फैसले के समय को छोड़ भी दें तो रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के संसद की समिति के सामने दिए गए विरोधाभासी बयानों को ही ले लीजिए।

उन्होंने पहले तो यह बताया कि सरकार ने नोटबंदी को लेकर रिजर्व बैंक की राय मांगी थी और यह भी कहा कि सरकार ने अपना दृष्टिकोण भी बताया था। यह सब 7 नवंबर, 2016 को हुआ और 8 नवंबर को सरकार की ओर से फैसला सुनाया गया। फिर, बार-बार सरकार की ओर से फैसले को लागू करने को लेकर हस्तक्षेप किया जाता रहा।

यह सारी बातें जाहिर करती हैं कि नोटबंदी का फैसला केंद्र सरकार का ही था जिस पर आरबीआई से केवल रजामंदी की औपचारिकता करवाई गई। बेहतर तो यही होता कि आरबीआई अपनी स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए अपने स्तर पर फैसले लेता। इससे उसके कामकाज की विश्वसनीयता बनी रहती।
शंकर शर्मा
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