Patrika Opinion : वैकल्पिक ऊर्जा उत्पादन से ही होगा समाधान

कोयला आपूर्ति जल्द सुचारू न हुई तो देश को अब तक के सबसे बड़े बिजली संकट से जूझना पड़ सकता है। दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक रीतने को है। कई बिजली संयंत्रों में उत्पादन रोकना पड़ा है या यह पूरी क्षमता से नहीं हो पा रहा है।

By: Patrika Desk

Published: 11 Oct 2021, 07:47 AM IST

दो माह पहले चीन में कोयले की कमी से बिजली संकट गहराने और उद्योगों पर कटौती लागू करने की खबरें आई थीं, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भारत में भी ऐसा संकट आने वाला है। भारत के बिजली उत्पादन केंद्रों में दो-तीन दिन से कोयले को लेकर मचे हाहाकार ने चिंता बढ़ा दी है। राज्यों ने केंद्र से मदद मांगी है तो बिजली सप्लाई करने वाली कंपनियां ग्राहकों को सोच-समझकर बिजली खर्च करने की सलाह दे रही हैं। दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक रीतने को है। कई बिजली संयंत्रों में उत्पादन रोकना पड़ा है या यह पूरी क्षमता से नहीं हो पा रहा है। कोयला आपूर्ति जल्द सुचारू न हुई तो देश को अब तक के सबसे बड़े बिजली संकट से जूझना पड़ सकता है।

कोयले की किल्लत का अंदेशा केंद्र सरकार को पहले से था। इसीलिए केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने 27 अगस्त को पावर सिस्टम ऑपरेशन कॉरपोरेशन (पोसोको), केंद्रीय बिजली प्राधिकरण, रेलवे और कोल इंडिया लिमिटेड के प्रतिनिधियों की कोर मैनेजमेंट टीम (सीएमटी) का गठन किया था। सीएमटी दैनिक आधार पर कोयले के स्टॉक की निगरानी और प्रबंधन के साथ बिजली संयंत्रों को कोयले की आपूर्ति सुधारने के लिए रेलवे तथा कोल इंडिया से समन्वय की कार्रवाई में जुटी थी। इसके बावजूद पानी सिर के ऊपर से गुजर गया। मांग के अनुरूप कोयला खदानों से आपूर्ति नहीं हो पा रही है। भारत में करीब 72 फीसदी बिजली की मांग कोयले के जरिए पूरी की जाती है। कोयले की किल्लत का एक कारण मौसम भी है। अगस्त और सितंबर में कोयला खदानों वाले इलाकों में लगातार बारिश से कम कोयला बाहर आया। भारत अगर दुनिया में चौथे नंबर का कोयला उत्पादक है, तो खपत के मामले में भी पीछे नहीं हैं। उत्पादन से ज्यादा खपत के कारण हम कोयले के आयात में दूसरे नंबर पर हैं।

कोयला आपूर्ति में असंतुलन के पीछे एक कारण यह भी है कि कई राज्यों की सरकारी बिजली कंपनियों ने कोल इंडिया का भुगतान अटका रखा है। कोयला और खनन मंत्री प्रह्लाद जोशी ने अगस्त में लोकसभा में बताया था कि 31 मार्च 2021 तक राज्यों के बिजली बोर्डों और सरकारी बिजली कंपनियों पर कोल इंडिया का 21,619.71 करोड़ रुपए बकाया था। बहरहाल, यह वक्त हिसाब-किताब का नहीं है। फौरी तौर पर संकट से पार पाने के उपाय होने चाहिए। इस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि बिजली उत्पादन में कोयले पर निर्भरता कैसे कम की जा सकती है। पर्यावरण-रक्षा की दृष्टि से भी अक्षय स्रोतों पर आधारित बिजलीघर वक्त की मांग हैं।

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