देश के सुनहरे भविष्य के लिए कानूनी समुदाय हमेशा करता रहे मार्गदर्शन - एन.वी. रमना

- वकील जन अभियानों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं। वकीलों में नेतृत्व के गुण जन्मजात होते हैं। ये गुरु, पथ-प्रदर्शक, मित्र और दार्शनिक होते हैं। उन्हें हमेशा समाज में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और लोगों की समस्याएं सुलझाने में आगे रहना चाहिए। कोई भी जन अभियान देख लीजिए वकीलों ने हमेशा बढ़-चढ़ कर उसमें भाग लिया है।

By: Patrika Desk

Updated: 07 Sep 2021, 10:06 AM IST

खुशी है कि लंबे समय बाद हम लोग मिल रहे हैं। कोरोना महामारी के मद्देनजर मैं कुछ विशेष पाबंदियों को मानता हूं, लेकिन बार काउंसिल के आग्रह को नहीं टाल सका। बार काउंसिल (bar Council) और बार एसोसिएशन (bar Association) मेरी कमजोरी है। मैंने अपनी उम्र का बड़ा हिस्सा बार काउंसिल के सदस्य के तौर पर गुजारा है। एक वकील ही होता है, जो अपनी सोच व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होता है। लगता है, यह अवसर मुझे भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में मेरी जिम्मेदारियां याद दिलाने के लिए है। पढ़िए 4 सितम्बर 2021 को आयोजित आभार कार्यक्रम में उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमना के संबोधन के संपादित अंश ।

निस्संदेह वकील न्यायपालिका के रथ के महत्त्वपूर्ण पहिए हैं। 1960 से अस्तित्व में आई बार काउंसिल वकालत के आदर्शों को प्रोत्साहित करने में संलग्न है। कानूनी शिक्षा से लेकर कानूनी पेशे, कानून के बारे में जागरूकता लाने और कानूनी सहायता देने के लिए बार काउंसिल सक्रिय है। देश के कानूनी परिदृश्य में बार काउंसिल की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण है। हाल ही बार काउंसिल के कानूनी शिक्षा एवं व्यवसाय के विकास संबंधी परामर्श बोर्ड के अध्यक्ष के तौर पर मैं पहले ही बहुत सी चिंताएं जता चुका हूं और विधि व्यवसाय के विकास और भविष्य पर परामर्श भी दिए हैं।

कानून के पेशे को सदा से ही संपन्न व्यक्ति से जोड़ कर देखा गया। केवल संपन्न और वर्ग विशेष के लोग ही इस व्यवसाय को अपनाते थे। धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। अब समाज के हर वर्ग के लिए वकील और जज बनने के अवसर खुले हैं, लेकिन लगता है ग्रामीण और कमजोर वर्ग के ज्यादातर लोग अब भी इस व्यवसाय में नामांकन नहीं करवा रहे हैं। कानून अब तक शहरी वर्ग का पेशा माना जाता है। वह इसलिए, क्योंकि एक युवा वकील की राह में बहुत-सी बाधाएं आती हैं। जब तक आपका कोई संरक्षक न हो, इस व्यवसाय में स्थायित्व की गारंटी नहीं है।

एक और बात पर प्रकाश डालना जरूरी है कि ज्यादातर महिला अधिवक्ताओं को संघर्ष करना पड़ता है। बहुत कम महिलाएं ही उच्च पदों तक पहुंच पाती हैं। आजादी के 75 वर्ष बाद महिलाओं को सभी स्तरों पर 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक हम सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं को केवल 11 प्रतिशत ही प्रतिनिधित्व दे सके हैं। कुछ राज्यों में आरक्षण नीति के कारण यह संख्या अधिक भी हो सकती है, परन्तु वास्तविकता यही है कि हमें इस क्षेत्र में महिलाओं का स्वागत करना होगा।

विदेशों की तरह हमारे देश में भी कानूनी पेशे का निगमीकरण होने लगा है। कई अच्छे युवा वकील लॉ फर्मों से जुडऩे लगे हैं। इससे प्रगति के नए मार्ग जरूर खुले हैं, लेकिन वकीलों की पारंपरिक प्रैक्टिस में कमी आई है। आम आदमी अच्छी कानूनी सलाह के लिए ऊंची कीमत अदा नहीं कर सकता। न्याय पाने में होने वाला अत्यधिक खर्च और न्याय मिलने में देरी सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर में कमी, प्रशासनिक स्टाफ कम होना और भारी संख्या में जजों के रिक्त पद अन्य चुनौतियां हैं। नेशनल ज्यूडिशियल इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन के गठन के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। पूरे देश से स्टेटस रिपोर्ट जुटाई गई हैं। इस संबंध में शीघ्र ही कानून मंत्री को एक प्रस्ताव भेजा जाएगा। सरकार से इस संबंध में पूर्ण सहयोग की अपेक्षा है।

मेरी कोशिश रही है कि उच्च पदों पर रिक्तियों की समस्या का त्वरित समाधान किया जाए। मेरी तुलना सचिन तेंदुलकर से हुई, लेकिन किसी भी खेल की तरह यहां भी टीम के प्रयास जरूरी हैं। मैं कॉलेजियम के अपने साथियों यू.यू. ललित, ए.एम. खानविलकर, डी.वाइ. चंद्रचूड़ और एल. नागेश्वर राव का आभारी हूं। इन सबने इस कोशिश में मेरा साथ दिया। सामूहिक प्रयासों से सुप्रीम कोर्ट में रिक्तियों की संख्या केवल एक रह गई। विभिन्न हाई कोर्ट के लिए 82 नामों की सिफारिश की गई है, फिलहाल हाईकोर्ट के 41 प्रतिशत रिक्त पदों को भरना हमारे समक्ष चुनौती है।

वकील जन-अभियानों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं। वकीलों में नेतृत्व के गुण जन्मजात होते हैं। ये गुरु, पथ-प्रदर्शक, मित्र और दार्शनिक होते हैं। उन्हें हमेशा समाज में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और लोगों की समस्याएं सुलझाने में आगे रहना चाहिए। कोई भी जन अभियान देख लीजिए, वकीलों ने हमेशा बढ़-चढ़ कर उसमें भाग लिया है। वकील को हरफनमौला होना चाहिए, उसे सामाजिक मुद्दों, इतिहास, अर्थव्यवस्था, राजनीति व साहित्य जैसे सभी विषयों की जानकारी होनी चाहिए। नानी पालखीवाला अर्थशास्त्री नहीं थे, लेकिन हर साल बजट पर जनता को संबोधित करते थे। समाज इसीलिए वकीलों को सम्मान देता है। यह हमारा कत्र्तव्य है कि हम जनता के विश्वास को बनाए रखें। मैं आपका आह्वान करता हूं कि जरूरतमंदों, महिलाओं, कर्मचारियों और वंचितों को उनके न्यायिक अधिकार दिलाने में मदद करें। जहां संभव हो, नि:शुल्क कानूनी सहायता दें और लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताएं। बार के युवा साथियों के लिए मेरा संदेश है कि इस सम्मानजनक पेशे के सिद्धांतों को न भूलें। हमारे व्यवसाय में वरिष्ठता का महत्त्व बहुत ज्यादा है। वरिष्ठ का आदर करें। उनके अनुभव, ज्ञान और विवेक का सम्मान करें। महिला साथियों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करें। संस्थान व जजों का सम्मान करें। आप कानूनी तंत्र की अग्रिम पंक्ति हैं। आपको इसे लक्षित, प्रेरित और गलत इरादों से किए गए हमलों से बचाना है।

बार के लिए जरूरी है कि वह निष्पक्ष और न्यायसंगत रहे। दुर्भाग्य से इस साल हमने बार के कई महत्त्वपूर्ण सदस्यों को खोया है। कोविड ने कई प्रतिभाशाली वकील हमसे छीन लिए। भारतीय बार काउंसिल और स्टेट बार एसोसिएशन ने इस मुश्किल घड़ी में वकीलों की सहायता के लिए कई कदम उठाए हैं। प्रधान न्यायाधीश बनने के बाद मैंने भी कानून मंत्री को पत्र लिख कर इस बारे में अवगत करवाया है। मुश्किलों को आसान बनाने के प्रयास हमें खुद भी करने होंगे। मैं भी शिकायत समाधान व्यवस्था विकसित करने का प्रयास करूंगा। अमरीका के सॉलिसिटर जनरल रह चुके जॉन डब्ल्यू. डेविस के शब्द उद्धृत करना चाहूंगा- 'सच है, हम वकील कोई पुल नहीं बनाते, टावर नहीं बनाते, इंजन नहीं बनाते, लेकिन हम मुश्किलें आसान करते हैं, तनाव कम करते हैं, गलतियां सुधारते हैं और अन्य लोगों के भार स्वयं अपने सिर लेते हैं और अपने प्रयासों से मानव जीवन को शांतिपूर्ण बनाते हैं।' मुझे उम्मीद है कि कानूनी समुदाय देश के सुनहरे भविष्य के लिए हमेशा मार्गदर्शन करेगा।

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