भारत के समुद्री क्षेत्र में अमरीकी दुस्साहस

- अमरीकी सेना समुद्री क्षेत्रों के बारे में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला देकर राग अलापती है कि उसकी नौसेना ने कुछ गलत नहीं किया।

By: विकास गुप्ता

Published: 12 Apr 2021, 07:38 AM IST

इजाजत के बगैर भारत के समुद्री क्षेत्र में अमरीकी नौसेना का नौपरिवहन अभ्यास (फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन) गंभीर चिंता का विषय है। मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब भारत राजनयिक चैनल के जरिए अमरीका को अपनी चिंताओं से अवगत कराता है और अमरीकी सेना समुद्री क्षेत्रों के बारे में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला देकर राग अलापती है कि उसकी नौसेना ने कुछ गलत नहीं किया।

अमरीकी नौसेना के सातवें बेड़े ने खुद बयान जारी कर खुलासा किया था कि 7 अप्रेल को उसके युद्धपोत 'यूएसएस जॉन पॉल जोन्स' ने नौपरिवहन अधिकारों और स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया। यह सब लक्षद्वीप से 130 समुद्री मील दूर भारतीय क्षेत्र में किया गया। बयान में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह कम आपत्तिजनक नहीं है। बयान में कहा गया, 'भारत का यह दावा कि उसके विशेष आर्थिक क्षेत्र में सैन्य अभ्यास या आने-जाने से पहले उसे सूचना देनी होगी, अंतरराष्ट्रीय कानूनों से मेल नहीं खाता। अमरीकी नौसेना पहले भी ऐसे अभ्यास करती रही है। आगे भी करती रहेगी।' अमरीकी अभ्यास न सिर्फ भारत की समुद्री परिवहन सुरक्षा नीति का उल्लंघन है, बल्कि देश की सम्प्रभुता के लिए बड़ी चुनौती भी है। किसी भी तटीय देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र की सीमा समुद्र तट से 200 नॉटिकल मील (370 किलीमीटर) की दूरी तक होती है। इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य गतिविधि के लिए उस देश की इजाजत जरूरी है। अंडमान निकोबार में एक चीनी जहाज ने 2019 में इसी तरह की हरकत की थी। तब भारत के कड़े विरोध का अमरीका ने समर्थन किया था। अब उसकी नौसेना ने वही किया है, लेकिन अमरीकी सरकार ने चुप्पी साध रखी है। क्वॉड देशों के नेताओं की बैठक में हिंद प्रशांत क्षेत्र में फ्रीडम ऑफ नेविगेशन को मजबूत करने पर जोर जरूर दिया गया था। यह नहीं कहा गया था कि सहयोगी देश की इजाजत के बगैर उसके समुद्री क्षेत्र में इस तरह अभ्यास किया जाएगा। ऐसे अभ्यास के तहत अगर विदेशी जहाज किसी देश के जलमार्ग से गुजरता है, तो उस देश की सहमति जरूरी है। इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।

भारत और अमरीका रणनीतिक सहयोगी हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागीरी का मिलकर विरोध करते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो यदा-कदा अमरीकी जहाज का भारतीय क्षेत्र में नजर आना विशेष गंभीर बात नहीं है, लेकिन बगैर सूचना दिए अमरीकी नौसेना का अभ्यास खतरे की घंटी है। इस गलत परम्परा पर लगाम लगाना जरूरी है। भारत को मजबूती से अमरीका के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए। अपना यह रुख भी साफ कर देना चाहिए कि जिस तरह वह दूसरे देशों के समुद्री क्षेत्र का सम्मान करता है, अपने क्षेत्र के बारे में दूसरे देशों से भी इसी तरह के सम्मान की अपेक्षा रखता है। बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में हर मोर्चे पर परस्पर सहयोग और भरोसे के साथ पारदर्शिता भी बेहद जरूरी है।

विकास गुप्ता
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