राजनीति का एजेंडा बदलने में कामयाब हुआ अनाम किसान

कर्जमाफी फौरी राहत देने वाली योजनाभर है, जिसकी सीमाएं हैं, यह कांग्रेस समझती है या नहीं, यह अभी यक्षप्रश्न है।

 

By: dilip chaturvedi

Updated: 30 Dec 2018, 05:27 PM IST

विष्णु नागर, वरिष्ठ पत्रकार
इस साल के सबसे बड़े 'न्यूजमेकर' तो भारत के लाखों अनाम किसान हैं, जिन्होंने बहुत सहा है मगर पहली बार राजनीति का एजेंडा बदलने की सफल कोशिश की। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत इसका प्रमाण है। किसानों के मुद्दे को यहां तक पहुंचाने का श्रेय वामपंथी दलों के क्षेत्रीय नेतृत्व और योगेंद्र यादव को भी जाता है, जिन्होंने हाल के वर्षों में जमीनी स्तर पर काम किया।

कुछ जुमलों को छोड़ दें तो राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से गरिमामय व्यवहार का एक उदाहरण पेश किया है, जो विशेषकर पिछले पांच वर्षों में दुर्लभ से दुर्लभ होता जा रहा था। नई बनी तीन कांग्रेस सरकारों के आते ही उनसे किसानों की कर्जमाफी की घोषणा करवाने का वास्तविक श्रेय उन्हें ही जाता है। हालांकि यह निर्णय लागू कैसे होता है, यह सामने आना अभी बाकी है। कर्जमाफी अंतरिम तथा फौरी राहत देने वाली योजनाभर है, जिसकी सीमाएं हैं, यह कांग्रेस समझती है या नहीं, या समझना चाहती है या नहीं, यह अभी यक्षप्रश्न है। वरना उसकी गति भी आखिर में वही होगी, जो फिलहाल भाजपा की हो रही है और आगे हो सकती है।

2018 इसलिए भी याद किया जाएगा कि 2017 तक बहुतों को लग रहा था कि 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है। इस वर्ष ने उनकी उस अजेय-निर्विकल्प छवि को ध्वस्त किया है। जो अमित शाह पिछले साल तक सबसे बड़े रणनीतिकार और संगठनकर्ता लग रहे थे, अब ठीक वैसे नहीं रहे। लोगों की हताशा किसी भी रणनीति, धन की कितनी भी अकूत ताकत को विफल कर सकती है, यह विश्वास अब लौटता नजर आ रहा है। लेकिन यह मानना पड़ेगा कि संगठन की दृष्टि से भाजपा अब भी मजबूत है, उसका बुनियादी समर्थक समूह सुरक्षित है, जिसे न केवल धर्मनिरपेक्षता विरोधी, बल्कि जनतंत्र विरोधी भी इस बीच अधिक बना दिया गया, जो हर नाराज आवाज को कुचलने में विश्वास रखता है।

जहां तक सांस्कृतिक क्षेत्र का सवाल है, 2018 में कर्नाटक संगीत के युवा व बड़े हस्ताक्षर टीएम कृष्णा और नसीरुद्दीन शाह ने गंभीर और दृढ़ स्वर में अपनी असहमतियों को निर्भीकता से, धमकियों के बीच, दर्ज किया है। उनकी असहमतियों में न छिछोरापन है और न अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने की रणनीति है, जिसका आरोप इन पर लगाया गया है। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के बड़े कलाकार हैं और अडिग धर्मनिरपेक्षतावादी भी। साहित्य, कला और पत्रकारिता के क्षेत्र में ही अब कुछ सच्ची आवाजें सुनाई देती हैं।

(लेखक , कवि और गद्यकार, 'कादम्बिनी' और 'शुक्रवार' के पूर्व संपादक।)

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