पुरातन और विज्ञान : प्राचीन भारत और रोगाणु

अयोध्या से निष्कासन के बाद गर्भवती सीता जब वाल्मीकि आश्रम में पहुंचती हैं, तब वाल्मीकि उन्हें जिस पर्ण-कुटी में आश्रय देते हैं, उस कुटिया के चारों ओर परिचारिकाओं से रोगाणुओं से सुरक्षा के लिए कीटनाशक द्रव्य का छिड़काव कराते हैं।

By: विकास गुप्ता

Updated: 12 Jul 2021, 08:32 AM IST

प्रमोद भार्गव, (लेखक एवं साहित्यकार, मिथकों को वैज्ञानिक नजरिए से देखने में दक्षता)

जब भगवान राम ने शिव धनुष तोड़ दिया, तब कुपित परशुराम ने जनकपुरी से अयोध्या लौटते महाराज दशरथ, उनके चारों पुत्रों व पुत्र-वधुओं को मार्ग में रोक लिया था। परशुराम ने राम की परीक्षा लेने की दृष्टि से उन्हें वैष्णवी धनुष देकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ाकर संधान करने को कहा। राम ने धनुष हाथ में लेकर पलभर में प्रत्यंचा चढ़ा दी और आसमान की ओर निशाना साधते हुए बोले, 'प्रभु इसे किस दिशा में छोडूं?' तब परशुराम बोले, 'राम शस्त्र और अग्नि का एकसा स्वभाव होता है। अग्नि जहां भी गिरेगी, वह उसे राख में बदल देगी। इसी तरह शस्त्र गिरने की परिणति विध्वंस है। शस्त्र-अस्त्र के संधान से असीमित ऊर्जा और ध्वनि प्रस्फुटित होती है। बाण तीव्र गति से वायुमंडल को मथता हुआ, सूक्ष्म जीवों को करोड़ों की संख्या में नष्ट करता हुआ आगे बढ़ता है। विप्लव से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। अतएव शर-संधान तभी करो, जब शत्रु से मनुष्यता संकट में पड़ जाए।' अयोध्या से निष्कासन के बाद गर्भवती सीता जब वाल्मीकि आश्रम में पहुंचती हैं, तब वाल्मीकि उन्हें जिस पर्ण-कुटी में आश्रय देते हैं, उस कुटिया के चारों ओर परिचारिकाओं से रोगाणुओं से सुरक्षा के लिए कीटनाशक द्रव्य का छिड़काव कराते हैं।

महाभारत युद्ध के अंत में जब अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र छोड़ देते हैं, तब भी इस शस्त्र के प्रभाव सूक्ष्म जीवों से लेकर संपूर्ण जीव जगत के नष्ट होने के परिप्रेक्ष्य में दर्शाए गए हैं। जिस एरका घास से यादवों के नाश का वर्णन महाभारत के अंत में है, वह घास भी संभवत: एक जैविक हथियार थी। वजह यह है कि कृष्ण द्वारा एक तिनका तोड़कर अपने ही वंश के लोगों पर प्रहार करने के बाद वह द्विगुणित-बहुगुणित और फिर नहीं गिने जा सकने वाले रूपों में रूपांतरित हो जाती है, यह स्वभाव घातक जीवाणुओं व विषाणुओं में ही देखने में आता है। ऐसा लगता है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने सूक्ष्म-जीवों के अस्तित्व और उनके प्राणियों से संबंध के बारे में भी हजारों साल पहले ही ज्ञान अर्जित कर लिया था। दक्षिण भारत के कांचीपुरम से समुद्री मार्ग से चीन पहुंचे बोधिधर्मन नाम के बौद्ध भिक्षु भी विषाणुजनित महामारियों और उनके आयुर्वेद से उपचार का ज्ञान रखते थे। 520-526 ईसवी में चीन में उन्होंने ही ध्यान, योग और बौद्ध धर्म की नींव रखी थी।

विकास गुप्ता
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