आपकी बात, क्या देश के नेता ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चल रहे हैं?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

By: Gyan Chand Patni

Published: 29 Dec 2020, 05:49 PM IST

पीछे छूट गए विकास के मुद्दे
भारत की धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के रूप में पहचान रही है। यहां हर धर्म के सम्मान की परंपरा रही है, लेकिन पिछले कुछ समय से माहौल बदला हुआ नजर आता है। आज धर्म में नाम पर जन मानस इस हद बंट गया है कि धार्मिक एकता के संबंध में कोई बात करता भी नजर नहीं आता। सिर्फ धर्म ही नहीं, जाति व क्षेत्र के आधार पर भी लोगों को बांटा गया है। लोगों के मस्तिष्क में ये भावनाएं इस हद तक भर दी गईं हैं कि उन्हें इन मुद्दों पर देश हित व विकास के सभी मुद्दे छोटे लगते हैं।
-नटेश्वर कमलेश, चांदामेटा,मध्यप्रदेश
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जनता की एकता से किसको खतरा
‘बांटो और राज करो’ की नीति के बीज अंग्रेजों ने बोए थे। वे जानते थे कि हिंदुस्तान पर राज करना है तो हिंदू-मुस्लिम को एक नहीं होने देना है। ब्रिटिश जनरल सर चार्ल्स नेपियर ने कहा था, ‘ जिस दिन भारतीय, एक होना सीख गए, उस दिन वे हमारी तरफ दौड़ेंगे और हमारा खेल खत्म कर देंगे। देश की जनता भली-भांति जानती है कि बांटने की राजनीति अब भी चल रही है। देश के नेता अपनी राजनीति चलाने और स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैंं। इसके हजारों उदाहरण इतिहास में काले अक्षरों में लिखे जा चुके हैं। ‘बांटो और राज करो’ की नीति को बल देने वाले समुदाय, दलों, संगठनों व नेताओं पर लगाम लगाने का प्रयास किया जाए।
-भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
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फूट डालो और राज करो
देश के ज्यादातर नेता समाज में नफरत के बीज बोते हैं, ताकि वे वोट की फसल काट सकें। जातीय उन्माद पैदा करना, धार्मिक विद्वेष पैदा करना इनकी फितरत है। ऐसे नेता लोकतांत्रिक व्यवस्था को कलंकित करने का काम करते हैं। ‘फूट डालो और राज करो’ का सिद्धांत इनका हथियार बन गया है।
-सत्येन्द्र कुमार पाण्डेय, मंडीदीप रायसेन
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अवसरवादी नेता
राजनीति समाज को दिशा देने के साथ ही उसकी समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त करती है। मुश्किल यह है कि आज राजनीति दिशाहीन होती जा रही और नेता अवसरवादी। पार्टी बदलना और नई पार्टी बनाना तो खेल बन गया है। कोई बात जमी नहीं कि पार्टी बदली, क्योंकि दूसरा दल उसे लेने को तैयार खड़ा है। जोड़-तोड़ की राजनीति चरम पर है। यह बात तो तय है कि सत्ता के लिए जोड़ तोड़ की ऐसी राजनीति लोकतंत्र के हित में नहीं है। सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दल नैतिकता और मर्यादा को तार-तार करते देखे जा रहे हैं। विचारधाराओं को ताक में रख रहे हैं।
-साजिद अली, इंदौर
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अंग्रेजों का अनुसरण
अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति के बल पर भारत पर बरसों राज किया। भारतीय राजनीति में भी तो इस नीति का इस्तेमाल बढ़-चढ कर किया जा रहा है। आज धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र को लेकर समाज को विभाजित किया जा रहा है।
-धर्मेंद्र कौशिक, भीलवाड़ा
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नेताओं के विषैले बोल
स्थानीय नेता से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्व रखने वाले नेता जातिवाद, क्षेत्रवाद, वर्गवाद जैसे संकुचित विचारों से ग्रसित हैं। साम्प्रदायिकता के विषैले बोल राजनेताओं के भाषणों में सुनने को मिल जाते हैं। अपनी राजनीति को चमकाने के लिए नेता अन्य धर्म पर घृणा से पूरित विवादास्पद बयानों को दर्ज कराने में भी नहीं हिचकते हैं।
-मनु प्रताप सिंह चींचडौली, जयपुर
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चिंताजनक प्रवृत्ति
‘बांटो और राज करो’ की नीति भारतीय राजनीति ने अंग्रेजों से सीखी। धर्म के आधार पर बांटने के लिए खास धर्म से जुड़े लोगों के लिए घोषणाएं होती हैं। क्षेत्र के मुद्दे पर बांटने के लिए ‘केवल खुद के राज्य’ के लोगो को रोजगार देने वाले फैसले होते हैं। भाषा के आधार पर बांटने के लिए भाषायी आंदोलनों को हवा दी जाती है। यह ङ्क्षचताजनक प्रवृत्ति है।
-प्रकाश पराशर, भीलवाड़ा
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सत्ता का सूत्र
‘फूट डालो और राज करो’ की नीति सत्ता हासिल करने और बनाए रखने के लिए बहुत उपयोगी साबित होती है। अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाने के लिए और उसके बाद लंबे समय तक गुलाम रखने के लिए इस नीति का इस्तेमाल किया था। नेता भी यही कर रहे हैं। यह अलग बात है कि इससे देश को नुकसान हो रहा है।
-मुकेश जैन चलावत, पिड़ावा
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जनता की परवाह नहीं
यह बात सही है कि राजनीतिक पार्टियां केवल सत्ता के पीछे भाग रही हैं। उन्हें जनता और लोकतांत्रिक व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। येन-केन प्रकारेण सत्ता हासिल करना ही राजनीतिक पार्टियों का उद्देश्य रह गया है। नेताओं का केवल एक ही उद्देश्य है पद-प्रतिष्ठाा हासिल करना। वे अपने स्वार्थ के चक्कर में जनहित की अनदेखी करते हैं।
-रमेश कुमार लखारा, बोरुंदा, जोधपुर
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देश के विकास में बड़ी बाधा
हमारे देश में विभिन्न धर्मों और जातियों से जुड़े लोग रहते हैं। राजनेता उनके बीच अविश्वास के बीज बोकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। यह लम्बे समय से चलता आ रहा है। आप यूं कह सकते है, कि यह परम्परा हमें अंग्रेज दे गए। अब राज करने के लिए हमारे नेता कभी जातीय कार्ड खेलते हैं, कभी धर्म का कार्ड खेलते हैं और मजे से राज करते हैं। यह देश के विकास के मार्ग में बड़ी बाधा है।
-नरेश मेहन, हनुमानगढ़
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घृणा न फैलाएं नेता
हाल ही एक जाने-माने नेता का बयान छपा था कि देश बंट जाएगा। सवाल यह कि इसे बांट कौन रहा है? जनता तो नहीं बांट रही है। वे लोग ही देश को बांट रहे हैं जो धर्म, जाति और भाषा के नाम पर राजनीति करते हैं और अपने जहरीले भाषणों से आम लोगों को गुमराह करके वोटों की मांग करतें है। नेताओं को समाज में जहर घोलना बंद करना होगा।
-हरिप्रसाद चौरसिया, देवास, मध्यप्रदेश

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