'बहुमत' नहीं, 'सर्वमत' आवश्यक

लोकतंत्र जैसी कोई भी व्यवस्था घटना नहीं होकर क्रमिक प्रक्रिया होती है। वर्तमान कहे जाने वाले किसी भी कालखंड की जड़ें अतीत में होती हैं। भारत के वर्तमान लोकतंत्र की 'गहरी' जड़ें हजारों साल पुराने आदिम गणतंत्रों में समाई हुई हैं।

By: dilip chaturvedi

Published: 25 Dec 2018, 02:52 PM IST

हरि राम मीणा
आजकल सहभागी लोकतंत्र की बहुत बातें की जा रही हैं। भारत के प्रधानमंत्री महोदय ने एक कार्यक्रम (14 जुलाई, 2018) के दौरान सैद्धांतिक तौर पर यह बात जोर देकर कही कि 'अगर कोई नागरिक यह समझता है कि मतदान के साथ ही उसकी जनतांत्रिक भूमिका संपन्न हो जाती है तो हमारा लोकतंत्र अधूरा है।' उन्होंने आगे कहा कि चुनाव-प्रक्रिया के समापन के साथ नई सरकार के बन जाने के बाद यदि अगला चुनाव जीतने पर ही ध्यान केन्द्रित रहे तो यह जनतांत्रिक भावना नहीं कही जाएगी।

स्विट्जरलैंड जैसे देशों में जहां प्रत्यक्ष प्रजातंत्र हैं, वहां किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर जनमत संग्रह (रेफरेंडम), किसी क्षेत्र विशेष के नागरिकों के लिए आत्मनिर्णय के अधिकार (प्लेबिसाइट) एवं किसी जनप्रतिनिधि अथवा लोकसेवक की कत्र्तव्यविमुखता की दशा में पदच्युति (रिकॉल) जैसे संवैधानिक प्रावधान हैं। इस तरह की व्यवस्थाओं से लोकतंत्र में नागरिकों की सजग भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। भारत जैसे विशाल देशों में ऐसा करना व्यावहारिक नहीं माना जाता है। इसलिए हमारे यहां लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी के लिए पंचायतीराज प्रणाली लागू की गई ताकि प्रजातांत्रिक राजनीति एवं पंचायत संस्थाओं के स्तर पर स्वायत्तता व आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर हुआ जा सके।

यह व्यवस्था हमें उन्हीं प्राचीन आदिकालीन गणतंत्रों की याद दिलाती है, जिनकी आधारभूत इकाई 'ग्राम' ही हुआ करती थी। ध्यान रहे कि 'जन-लोकपाल अधिनियम' की मांग के लिए जब दिल्ली में अन्ना हजारे की टीम ने धरना दिया था, तब स्वयं अन्ना हजारे ने इस बात पर जोर दिया था कि 'भारत में जो प्रजातंत्र है वह द्ग जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए द्ग की भावना के अनुरूप नहीं है।' जनतंत्र के प्रति यह कैसी प्रतिबद्धता है कि जनतांत्रिक सहभागिता की बात करने वाले नायक मात्र 12 दिन की अवधि में अपने संकल्प से दूर चले जाते हैं; अन्ना यकायक चुप हो जाते हैं, किरण बेदी पुड्डुचेरी की राज्यपाल की हैसियत से जनता द्वारा चुनी गई सरकार के काम में बाधा उत्पन्न करने लगती हैं, दिल्ली के मुख्यमंत्री बनकर भी केजरीवाल उपराज्यपाल के चक्कर में ही उलझे रहते हैं।

क्या यह सब हमारे उस गणतंत्र का विरोधाभास या अंतरविरोध नहीं है, जिसे हम जन-सहभागीदारी से समृद्ध करने का सपना देख रहे हैं? जनतंत्र में जन-सहभागीदारी को केंद्र में रखकर डॉ. स्टीवन मुहल्बर्गर ने लिखा था कि 'प्राचीन भारत की गणतंत्रात्मक प्रणालियों के अनुभव इस विचार को सिरे से खारिज कर देते हैं कि आधुनिक लोकतंत्र का विचार पाश्चात्य विश्व की देन है।'

जहां तक वर्तमान लोकतंत्र की 'सतही' जड़ों का प्रश्न है तो वे ब्रितानी लोकतंत्र से जुड़ती हैं। इसकी पहली परत ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद ब्रिटिश ताज-राज में 1858 के भारत सरकार अधिनियम व 1861 के भारत परिषद अधिनियम के साथ शुरू हो जाती है। दूसरी परत को 1885 में गठित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पृष्ठभूमि में निर्मित 1892 के भारत परिषद अधिनियम, स्वायत्त शासन की मांग के रूप में आजादी की लड़ाई के दबाव में पारित 1909 व 1919 के भारत परिषद अधिनियम, और अंत में 1935 के भारत शासन अधिनियम के रूप में देखा जा सकता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में वर्तमान भारतीय लोकतंत्र का विकास हुआ है।

लोकतंत्र जैसी कोई भी व्यवस्था घटना नहीं होकर क्रमिक प्रक्रिया होती है। वर्तमान कहे जाने वाले किसी भी कालखंड की जड़ें अतीत में होती हैं। भारत के वर्तमान लोकतंत्र की 'गहरी' जड़ें हजारों साल पुराने आदिम गणतंत्रों में समाई हुई हैं। जब संविधान निर्मात्री सभा में जनतंत्र पर गहन विचार-मंथन चल रहा था, तब सभा के एकमात्र मुखर आदिवासी सदस्य जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था-'आप आदिवासियों को लोकतंत्र नहीं सिखा सकते... यह उनके खून में आदिकाल से है।' पंडित नेहरू ने 'डिस्कवरी ऑफ इण्डिया' में सिंधु सभ्यता के बारे में लिखा है-'आदिवासियों के बहुत सारे गणतांत्रिक समाज-राज्य थे, और उनमें से कई बहुत बड़े क्षेत्र पर स्थापित थे।'

एक भाषण के दौरान जब अमेरिका के चिंतक नोम चोम्स्की से यह सवाल पूछा गया था तो उन्होंने महान अर्थशास्त्री एडम स्मिथ का संदर्भ देते हुए कहा था कि देश का स्वामित्व अब राजनीतिज्ञों के हाथों से निकलकर दिग्गज व्यापार प्रमुखों के कब्जे में चला गया है। ये व्यापार प्रमुख ही अपने हितों के अनुसार सारी नीतियां गढ़ते हैं। एक अर्थशास्त्री ने तो इससे आगे यह भी कहा कि इस खेल में अब राजनीतिज्ञों की भूमिका अपने आकाओं यानी व्यापार प्रमुखों को सुविधाएं मुहैया करवाने वाले सहायक तक ही सीमित रह गई है। जाहिर है कि चोम्स्की की उक्ति अमरीका से भी अधिक हमारे यहां लागू होती है और आज हमारे जनतंत्र का सबसे बड़ा संकट भी यही है। चिंता की बात यह है कि यदि इस हद तक अर्थ की सत्ता का हस्तक्षेप लोकतंत्र में हो रहा है तो विकसित मानव समाज होने का दावा करने वाले हम लोग किस तरह के गणतंत्रात्मक ढांचे की ओर अग्रसर हैं?

बहुमत पर आधारित वर्तमान लोकतांत्रिक प्रणालियों से गणतंत्र की आदिम अवधारणा इस अर्थ में भिन्न होती है कि वहां बहुमत के स्थान पर 'सर्वमत' को प्राथमिकता दी जाती थी। मानव समाज में वैचारिक भिन्नता स्वाभाविक है, किंतु विचार-विमर्श के आधार पर मतभेदों को दूर करते हुए सर्वसम्मति से निर्णय पर पहुंच जाना ही गणतांत्रिक पद्धति की सार्थकता है। सर्वमत तक पहुंचने में व्यवहार में संभव है कि गण-मुखिया की बात को वजनदार मान लिया जाए। उल्लेखनीय है कि 'मुखिया' की व्यवस्था भी सुविधा के लिए है।

भारतीय संदर्भ में यहां फिर एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या हमारा संविधान उपरोक्त अर्थ में 'गणतंत्र' की भावना को सम्मिलित किए हुए है अथवा नहीं? हमारे संविधान में संकल्पित शब्दयुग्म 'लोकतंत्रात्मक गणराज्य' है। यहां 'गणराज्य' शब्द लोकतंत्रात्मक राजनीतिक प्रणाली तक सीमित है जबकि 'गणतंत्र' शब्द जीवन के सभी क्षेत्रों में अपेक्षित सामाजिक पद्धति का सूचक, संकेतक व वाहक है।

सैद्धांतिक स्तर पर ही जब हम गणतंत्र के प्रति कटिबद्ध नहीं, तो व्यवहार की बात बहुत दूर रह जाती है। वर्तमान लोकतंत्रों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें एक राजनीतिक प्रणाली के रूप में ही स्वीकार किया गया है। यह सिद्धांत भी मताधिकार के उपयोग की प्रक्रिया द्वारा प्राप्त बहुमत की सरकारों तक ही सीमित है। लोकतंत्र की इस राजनीतिक प्रणाली का इतिहास इस तथ्य को भलीभांति प्रमाणित करता है कि प्राय: 50 फीसदी से कम मत प्राप्त राजनीतिक दल भी सत्तासीन हो जाते हैं, जो एक तरह से बहुमत के सिद्धांत को नकारना है।

महान दार्शनिक रूसो की 'सामान्य इच्छा' या 'आदिम गणतंत्र' के 'सर्वमत' के सिद्धांत पर आधारित वास्तविक राजनीतिक लोकतंत्र को क्रियान्वित करने में कठिनाइयां हो सकती हैं, किन्तु लक्षित करने के प्रयास तक नहीं किए जा रहे। स्पष्ट है, हम गणतंत्र के राजनीतिक सिद्धांत के प्रति भी पूरी तरह से ईमानदार नहीं हैं।

(लेखक, सेवानिवृत्त आइपीएस। अखिल भारतीय आदिवासी मंच के अध्यक्ष। मीरा पुरस्कार से सम्मानित।)

 

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