आर्ट एंड कल्चर : सिनेमा को बचा लिया, तो बच जाएगा अफगानिस्तान

Afghanistan cinema : अफगानिस्तान का सिनेमा सुरक्षित रखना होगा।
यदि तालिबानी सत्ता संभालते हैं, तो वे सभी कलाओं पर प्रतिबंध लगा देंगे।'

By: Patrika Desk

Published: 21 Aug 2021, 10:44 AM IST

विनोद अनुपम

(लेखक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक हैं)

Afghanistan cinema : ऐसे समय में जबकि मनुष्य की सांसों की गिनती हो रही हो, सिनेमा, संगीत और कला की बात बेमानी लगती है। लेकिन, किसी भी सच्चे कलाकार की तरह अफगानिस्तान फिल्म संगठन की अध्यक्ष सहरा करीमी को शायद यह अहसास होगा कि संहार का मुकाबला संस्कृति से ही हो सकता है। इसीलिए उन्होंने तालिबानियों की बढ़त देखते ही दुनिया भर के सिनेमा और कला संस्कृति से जुड़े लोगों से सक्रिय हस्तक्षेप की गुहार करते हुए मार्मिक चिट्ठी लिखी, '20 साल में हमने जो हासिल किया है, वह अब सब बर्बाद हो रहा है। हमें आपकी आवाज की जरूरत है। मैंने अपने देश में एक फिल्म निर्माता के रूप में जिस चीज के लिए इतनी मेहनत की है, उसके टूटने की आशंका है। यदि तालिबानी सत्ता संभालते हैं , तो वे सभी कलाओं पर प्रतिबंध लगा देंगे।'

वाकई सुकून से सिनेमा देखते हुए हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि तालिबान के पिछले दखल के समय किस तरह अफगानिस्तान फिल्म संगठन में काम करने वाले एक कर्मचारी हबीबुल्लाह अली ने अपनी जान पर खेल कर हजारों फीट फिल्में बचाई थीं। सिर्फ इसलिए कि अफगानिस्तान का सिनेमा जीवित रहे। वास्तव में वे सिनेमा नहीं, अपना देश बचा रहे थे। हमारे लिए सिनेमा में अफगानिस्तान का मतलब भले ही 'खुदा गवाह' और 'काबुल एक्सप्रेस' हो, सही मायने में अफगानिस्तान का सिनेमा उसके वजूद का प्रतीक रहा है। इसीलिए तमाम प्रतिबंधों और खतरों के बावजूद उसने अपनी सांसें बचाए रखीं। 1946 में ही शुरू हुई इस इंडस्ट्री को सबसे गहरा धक्का 1996 में लगा, जब इस्लाम के नाम पर तालिबानियों ने सिनेमा को पूर्णतया प्रतिबंधित कर सिनेमाघर तक बंद करवा दिए।

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लंबे अंतराल के बाद 2001 में काबुल में फिल्म प्रदर्शन की शुरुआत हुई और बाहर सक्रिय अफगानी फिल्मकारों ने देश लौटने की हिम्मत जुटाई। 2003 में बनी सादिक बरमक की 'ओसामा' गोल्डन ग्लोब अवार्ड से सम्मानित हुई। 2013 में सादिक अबेदी ने 'ए मैन्स डिजायर फॉर फिफ्थ वाइफ' के साथ इफ्फी में भाग लिया और बॉलीवुड से सहयोग की अपील की। सहरा करीमी की 2019 में आई फिल्म 'हव्वा, मरयम, आयशा' का वेनिस फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर ही नहीं हुआ था, ऑस्कर के लिए यह फिल्म नोमिनेट की गई थी। खास बात यह कि ये फिल्में अफगानिस्तान के बदलाव को रेखांकित कर रही थीं। ये फिल्में अफगानियों को हिम्मत दे रही थीं। आज जरूरत इस बात की है कि अफगानिस्तान का सिनेमा सुरक्षित रहे। इसके लिए हम जो कर सकते हैं, अवश्य करें। यह कला की सेवा होगी, मनुष्यता की सेवा होगी।

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