जीवाणु-विषाणु, बीमारियां एवं जलवायु

जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी मंडल के तापमान में वृद्धि हुई तथा आर्द्रता एवं वर्षा में भी परिवर्तन आया. यही कारण रहा जिससे रोग वाहकों के पर्यावास एवं प्रजनन में बदलाव हुआ. इस प्रतिकूलता से प्रतिरोध करने की उनकी क्षमता बढ़ गई।

By: Prashant Jha

Published: 10 May 2020, 05:59 PM IST

डॉ.लक्ष्मण सिंह राठौड़, पूर्व महानिदेशक, भारतीय मौसम केंद्र

जीवाणु एवं विषाणुओं से जनित महामारियों ने कई सभ्यताएं व साम्राज्य नष्ट किये हैं, इतिहास बदले हैं| कोरोना विषाणु ने भी मानव को अपने अस्तित्व के झरोखे में झाँकने को मजबूर किया है| सभ्यताओं के उद्गम से ही मानव नयी-नयी महामारियों से सामना कर रहा है, जिसमें सूक्ष्म-जीवों से फैलने वाली बीमारियां प्रमुख रही है| लगातार बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण ,शहरीकरण, वनों का विनाश, एवं जलवायु परिवर्तन के एकीकृत प्रभाव से जीवों की सक्रियता में बदलाव होता है। हमने देखा है कि बीसवीं सदी में सामान्य से अधिक महामारियां आई। कुछ शोध यह इंगित करते हैं कि भविष्य में नयी बीमारियों का प्रादुर्भाव अधिक संख्या, बारंबारता एवं तीव्रता के साथ हो सकता है, जिससे न केवल मानव जाति बल्कि सम्पूर्ण प्राणी जगत को खतरे का सामना करना पड़ सकता है| यह भी देखा गया है कि जो विषाणु केवल वन्यजीवों में पाए जाते थे, वे अचानक कूदकर इंसान के शरीर में जा बैठते हैं| वनस्पति जगत में भी स्थिति ऐसी ही है, पहले वायरस कुछ खास प्रजातियों को ही प्रभावित करते थे, अब उनका दायरा वहां भी बढ़ने लगा है| इन्ही कारणों से नई बीमारियां के संक्रमण में पिछले छह दशकों में चार गुना वृद्धि हुई है, और वर्ष 1980 से इनके प्रति वर्ष होने वाले प्रकोप में तीन गुना वृद्धि हुई है।

जलवायु के सन्दर्भ में इस बात का विश्लेषण आवश्यक है कि क्या इसमें परिवर्तन के कारण बीमारियों में वृद्धि हुई है? वैज्ञानिकों ने पाया है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण पर्माफ्रोस्ट मृदायें, अब तापमान बढ़ने के कारण धीरे-धीरे नए विषाणु और कीटाणु, जो उसके उस भूमि में बंद थे, का विसर्जन कर रही है| अतः इन नए सूक्ष्म-जीवों के खतरों को हल्के में नहीं लेना चाहिए| बीमारियों का प्रसार तथा संक्रमण वायु, जल, खाद्य तथा संपर्क के माध्यम से होता है, जिसके कई स्वरूप हो सकते हैं| ख़ास बात यह है कि जलवायु इन सभी कारकों को प्रभावित करती है। जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी मंडल के तापमान में वृद्धि हुई तथा आर्द्रता एवं वर्षा में भी परिवर्तन आया जिसके फलस्वरुप रोग वाहकों के पर्यावास एवं प्रजनन में बदलाव हुआ तथा प्रतिकूलता से प्रतिरोध करने की उनकी क्षमता बढ़ गयी| यह परिवर्तन हम मच्छरों द्वारा प्रसारित बीमारियों की तीव्रता एवं मात्रा में लगातार हुयी बढ़ोतरी से समझ सकते हैं| हमने यह भी देखा की मच्छरों द्वारा फैलाई जाने वाली मलेरिया, डेंगू, पीत-बुखार, चिकनगुनिया, एनसेफेलाइटिस, जीका-बुखार इत्यादि बीमारियों की व्यापकता और उससे संक्रमित लोगों की संख्या में गुणात्मक बढ़ोतरी हुई।

जल-जनित बीमारियों का प्रकोप और तीव्रता दोनों में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी हो रही

शुरुआत में पीत-बुखार केवल कुछ ही देशों में पाया जाता था लेकिन अब यह दुनिया के आधे से अधिक देशों में पाया जाता है। ऐसे ही डेंगू बुखार अब 125 देशों में अपनी दस्तक दे चुका है और इससे प्रभावित लोगों की संख्या 20 करोड़ तक पहुंच गई है। जलवायु एवं जैविक तत्वों के अंतर संबंधों के आधार पर जो मॉडल विकसित किए गए हैं, उनके पूर्वानुमान को अगर सच मानें तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है। उदाहरण के तौर पर मलेरिया के पूर्वानुमान करने वाले मॉडल यह इंगित करते हैं कि तापमान में वृद्धि हो जाने से मलेरिया की विस्तार क्षमता में तेजी से बढ़ोतरी होगी तथा वैश्विक तापमान अगर 2 से 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो बीमारी से प्रभावित लोगों की संख्या में 3 से 5% तक की वृद्धि हो सकती है। साथ ही मलेरिया के रितु-काल की अवधि भी बढ़ जाती है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अतिवृष्टि तथा बाढ़ में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है, जिसके चलते जल-जनित बीमारियों का प्रकोप और तीव्रता दोनों में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी हो रही है।

बाढ़ के क्षेत्रों में जल व मल निकासी में रुकावट होने तथा जल स्रोतों के प्रदूषित हो जाने से पानी के द्वारा संक्रमण फैल कर पेट की बीमारियों का प्रसार अधिक होता है| यह भी देखा गया है कि जल-स्रोतों के तापमान में वृद्धि होने के कारण सूक्ष्मजीवों की मात्रा में गुणात्मक वृद्धि होती है तथा उपलब्ध काईयां हानिकारक तत्वों का निर्माण करने लगती है, जिसके चलते भी बीमारियां अधिक फैलती है। समुद्र के तापमान में वृद्धि होने से भी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है जिसका भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हमने देखा कि वायु के तापमान में वृद्धि के साथ कई सूक्ष्मजीव जैसे कि सालमोनेला, ई-कोलाई एवं ऐसे ही अन्य जीवाणुओं-विषाणुओं के प्रजनन चक्कर में तीव्रता आ जाती है, जिसके फलस्वरूप वे कम समय में अधिक संख्या में प्रचलित हो जाते हैं, फलस्वरूप बीमारियों के लिए उचित वातावरण तैयार कर देते हैं| ऐसे में खाद्य पदार्थों के माध्यम से बहुत सी बीमारियां फैलती है, खासतौर से तब, जब लोग गर्मी वा वर्षा ऋतुओं में स्वच्छता की अनदेखी कर दें।

जहाँ तक कोविड-19 का प्रश्न है, इसके उत्पत्ति प्रकोप, विस्तारण, तथा डाह को समझने की आवश्यकता है. विषाणु उत्पत्ति के कई मार्ग हो सकते हैं। वह स्वयंभू भी हो सकता है, जिसके लिए उसे अपने डीएनए को रूपांतरित करना होता है, जो जलवायु अथवा अन्य किसी भी कारण से हो सकता है। अतः उसका मौसम व जलवायु से अंतर-संबंधोंको भी समझाना होगा। अभी तक हमें यह ठीक से ज्ञात नहीं कि कौनसी मौसम-जलवायु इसके लिए अनुकूल/प्रतिकूल है। भिन्न-भिन्न सतहों पर किस तापमान तक यह कितने समय तक सक्रिय रहेगा तथा किन मौसम परिस्थियों में यह कम/अधिक फैलता है, इस पर तुरंत शोध होना चाहिए। ईश्वर न करे कि कोरोना विषाणु रूपांतरित होकर मच्छर में प्रवेश कर जाये। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि अधिकांशतः महामारियां स्वयंभू होते हुए भी मानव निर्मित परिस्थितियों के बुलावे पर प्रगट हुयी, फिर मानव ने जितनी मेहमाननवाजी की वे उतने समय उसके पास रही, तत्पश्चात विशेष परिशितियों में स्वतः ही प्रस्थान कर गयी। हमें उनके आगमन, विस्तारण, प्रबंधन एवं प्रस्थान के सम्बंधित सभी परिस्थितियों को समझने हेतु शोध प्रयुक्त रहना होगा।

महामारी कालअवधि मृत्य प्रभाव क्षेत्र
1. अज्ञात 300 ई.पू. असंख्य चीन
2. ऐथनस का प्लेग 430 ई.पू. 100000 एथेंस
3. अंटोनाईन प्लेग 965-980 ई. 500000 रोमन साम्राज्य
4. साइप्रियन प्लेग 250- 271 ई. केवल रोम में 500 प्रति-दिन रोमन साम्राज्य
5 . जस्टीनीयन प्लेग 541 -542 ई. विश्व की 10 %आबादी वैश्विक
6. काली मौत 1946-53 ई. यूरोप की आधी आबादी एशिया, यूरोप
7. कोकोलितली महामारी 1545- 48 ई. 1.5 करोड़ मेक्सिको, मध्य अमेरिका
8. अमेरिकन प्लेग 16 वीं सदी पश्चिमी गोलार्द के ९०% स्थानीय लोग पश्चिमी गोलार्द
9. लन्दन का महाप्लेग 1665-66 ई. लन्दन की 15% आबादी इंग्लैंड
10. मर्सइल का महाप्लेग 1720-23 ई. 100000 रूस
11. फिलाडेल्फिया पीत बुखार 1793 ई. 5000 अमेरिका
12. फ्लू महामारी 1889-90 1000000 वैश्विक
13 अमेरिकन पोलियो 1996 ई. 6000 अमेरिका
14 स्पेनिश फ्लू 1998-99 ई. 10 करोड़ (भारत में 1.5 से 2 करोड़ वैश्विक
15.. एशियन फ्लू 1997-58 ई. 1,100000 सम्पूर्णविश्व 16. एड्स 1981 ई. से 4 करोड़ प्रभावित वैश्विक 17. स्वाइन फ्लू 2009-10 ई. 1.5-1.75
18. ई-बोला 2014-16 12 हज़ार अफ्रीका 19. जीका बुखार 2015 ई. से गरम व आर्द्र जलवायु में फैलाव अमेरिका
20. कोविड- 2019-20 वैश्विक

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